भारतीय नस्लवादी हिंसा के शिकार हुए हैं। संक्षिप्त विराम के बाद भारतीय समुदाय के तीन लोगों पर हमलवारों ने 'नृशंस प्रहार' किया है। लगभग ७० युवाओं के हमलावर समूह, जिसमें कई महिलाएं भी शामिल थीं, ने उपनगर एपिंग में २६ वर्षीय सुखदीप सिंह, उसके भाई गुरदीप सिंह और उनके चाचा मुख्त्यार सिंह पर हमला किया।
१६ सितंबर को ऑस्ट्रेलिया के एपिंग में तीन भारतीयों पर हुए हमले के बाद विक्टोरिया पुलिस ने हमले के संबंध में जानकारी जुटाने के लिए जांच शुरू कर दी। जबकि एक स्थानीय अखबार के कार्यकारी वरिष्ठ साजेंट ग्लेन पार्कर के हवाले से बताया गया है कि वास्तविक हमले में सिर्फ चार लोग ही शामिल थे और लगभग २० लोग वहां खड़े थे। इन हमलों के बाद विक्टोरिया के प्रधानमंत्री जान ब्रुंबी ने कहा कि वह पुलिस को नस्ली हमलों से निपटने के लिए ज्यादा से ज्यादा संसाधन और शक्तियां देगें। पुलिस हमलावरों से सख्ती से निपटेगी।
उन्होंने आश्वासन दिया कि जो भी लोग नस्ली हमलों में शामिल होंगे, वे अब कानून का पूरा दबाव महसूस करेंगे। भारत की यात्रा पर आने वाले ब्रुंबी ने विक्टोरिया को अब भी अपराध के मामले में ऑस्ट्रेलिया का सबसे सुरक्षित स्थान बतलाया है। हाल ही में ऑस्टे्रलियाई विदेश मंत्री स्टीफन स्मिथ ने भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को द्घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होने का आश्वासन दिया।
इस बीच ऑस्टे्रलिया में भारतीयों पर जारी हमलों के बीच ऑस्टे्रलियाई प्रधानमंत्री ने भारतीय छात्रों को जवाबी हमले न करने तथा कानून अपने हाथ में न लेने की चेतावनी दी। उनकी यह प्रतिक्रिया लेखक और कार्यकर्ता फारुख धोंडी द्वारा स्थानीय भारतीय समुदाय द्वारा कुछ जवाबी कार्रवाई करने के लिए कहे जाने के बाद आई है। भारतीयों पर हुए हमले के बाद धोंडी ने भारतीयों की एक बैठक में मामले को अपने हाथों में लेने के लिए कहा था। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स ने कहा कि ऑस्टे्रलियाई सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन खोखले साबित हुए हैं। फिसा अध्यक्ष ने कहा कि लोगों को अब भी पीटा जा रहा है और गाली भी दी जा रही है। लोगों को अब भी नस्ली टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है।
विदेशी छात्रों के कारण ऑस्टे्रेलिया का शिक्षा उद्योग फलफूल रहा है। पिछले साल ऑस्ट्रेलिया सरकार ने भारत के छात्रों को लुभाने के लिए विज्ञापनों पर ३५ लाख डॉलर खर्च किये थे। साथ ही हर साल भारत के छात्रों से ऑस्ट्रेलिया सरकार को लगभग ८००० करोड़ रूपये हासिल होते हैं। आज की मंदी के भयावह दौर में वहां की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा विदेशी छात्रों की फीस से ही आता है। ऐसे में यह तय है कि अगर विदेशी छात्रों ने ऑस्ट्रेलिया से मुंह मोड़ा तो उसकी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। हालांकि शिक्षण क्षेत्र पर बुरे असर की संभावना को देखते हुए ही ऑस्टे्रेलियाई सरकार हरकत में आयी थी। लेकिन बार-बार वह नस्लवाद से मुकर जाती है।
पर सवाल यह है कि नस्लीय हिंसा को रोक पाने में अब तक ऑस्ट्रेलिया सरकार नाकामयाब क्यों है और भारत इसे रोकने के लिए ऑस्ट्रेलिया पर कितना दबाव बना पाया है।
स्थानीय मीडिया ने माना है कि ब्रुंबी की आगामी भारत यात्रा चुनौतीपूर्ण हो सकती है। बुं्रबी ने यह भी स्वीकार किया ऐसी द्घटनाओं से उनकी भारत यात्रा और कठिन हो जाएगी। उन्होंने यह माना कि हाल ही में भारतीयों पर हमलों की द्घटनाएं ऑस्टे्रलिया और भारत के बीच खराब हुए संबंधों को सुधारने के उनके मिशन के लिए मुश्किल खड़ी करेंगी। अपनी सरकार द्वारा इस समस्या का समाधान करने की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि कुछ द्घटनाओं ने भारत में ऑस्ट्रेलिया और हमारी छवि को खराब किया है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों के प्रति नस्लीय हिंसा रुकती नजर नहीं आ रही है ऐसे में बुं्रबी भारतीय नेताओं और अभिभावकों को कैसे आश्वासन देंगे कि विक्टोरिया उनके बच्चे के लिए सुरक्षित स्थान है।
पिछले वर्ष अक्टूबर से अब तक ऑस्टे्रलिया में भारतीय छात्रों और प्रवासी भारतीयों पर सैकडों हमले हो चुके हैं। इस सब के बावजूद ऑस्टे्रलिया सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। इससे जाहिर होता है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार साफ तौर पर नस्लवाद को मानने को तैयार नहीं है। इन द्घटनाओं से ऑस्टे्रलिया में भारतीय छात्र भय के साये में जी रहे हैं। भारतीय छात्रों का ऑस्टे्रेलिया प्रशासन पर से भरोसा उठता जा रहा है। कई बार इस नस्लीय हिंसा के विरोध में हजारों की संख्या में छात्रों सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतर आये। भारत सरकार तथा छात्रों के विरोध के कारण ऑस्टे्रलिया सरकार ने भारतीय छात्रों की सुरक्षा के लिए टास्क फोर्स का गठन किया था। लेकिन इसका कोई खास प्रभाव नहीं हुआ।
नस्लवाद को जड़ से खत्म करने के लिए मार्टिन लूथरकिंग ने आवाज उठाई थी। उन्हीं को अपना आदर्श मानने वाले अश्वेत बराक ओबामा नस्लवादियों के द्घिनौने रूप से लड़ते हुए अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि नस्लवाद पतन की ओर अग्रसर है और जल्द ही यह पूरे विश्व से खत्म हो जाएगा। लेकिन फ्रांस में भारतीय विमान यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार के बाद अब ऐसा लगने लगा है कि गर्त में समा रहे नस्लवाद को किसी तिनके का सहारा मिल गया है।

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