पिछले कुछ अरसे से अमेरिका की स्थिति में जहां गिरावट देखने को मिली, चीन उसके मुकाबले में आगे निकलता दिखाई पड़ा। आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्र्तन पर अमेरिका को काफी फजीहत झेलनी पड़ी। ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को धता बताकर परमाणु संवर्धन करने में सफलता प्राप्त कर ली। अमेरिका इस से काफी द्घबराया हुआ है। ऐसे में ईरान पर और कडे़ प्रतिबंध लगाने के लिए चीन की मंजूरी जरूरी है। यही कारण है कभी दलाई लामा से मिलने से इंकार करने वाला ओबामा प्रशासन उनसे मुलाकात कर चीन पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है
दुनियाभर की दो महाशक्तियों चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखा जा सकता है। अमेरिका चीन पर दबाव बनाना चाहता है, तो चीन भी इस मामले में पीछे नहीं है। राष्ट्रपति ओबामा के कोपनहेगन की जलवायु शिखर बैठक के दौरान हुए अपमान और ईरान के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों के प्रस्ताव पर चीन की उल्टी राय से भी अमेरिका द्घबराया हुआ है। जलवायु परिवर्तन पर अंतिम समय में चीन का कटौती के प्रस्ताव से इंकार कर देना भी अमेरिका को रास नहीं आया। अमेरिका ने चीन पर दबाव बनाने के लिए पिछले दिनों ताईवान को अरबों डॉलर के आधुनिक श्रेणी के हथियार बेचे। गूगल सेंसरशिप मामले में दोनों देशों के मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं। पश्चिमी देश विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, ऐसे में चीन पर दबाव बनाना जरूरी हो गया। समझा जाता है कि इसी रणनीति के तहत अमेरिका ने चीन के लाख विरोधों के बीच तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा से मुलाकात की।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने १८ फरवरी को तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा से मुलाकात की। नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त इन नेताओं की मुलाकात वैसे तो अनौपचारिक थी, लेकिन इसे लेकर चीन ने काफी आपत्ति जताई। इस बैठक में जो हुआ या उससे भी बढ़कर जो नहीं हुआ, उसे आशाजनक तो कतई नहीं कहा जा सकता। दोनों नेताओं की मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस के मैप रूप में हुई। मैप ऑफिस में दलाई लामा से मुलाकात को ओबामा प्रशासन ने निजी करार दिया। मीडिया को यहां आने से रोक दिया गया। मुलाकात कक्ष में कैमरे के इस्तेमाल की इजाजत नहीं थी। दोनों नेताओं की मुलाकात भले ही मैप रूम में हुई पर इसकी गरज चीन में सुनाई पड़ी। चीन सरकार ने चीन में अमेरिकी राजदूत को तलब किया और ओबामा-दलाई लामा मुलाकात को सरासर 'हस्तक्षेप' की संज्ञा दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा चीन की जनता की राष्ट्रीय भावनाओं को इस मुलाकात से आद्घात पहुंचा इस बीच व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव रॉबर्ट गिब्स ने दोनों नेताओं के बीच हुई इस वार्ता के बाद कहा कि राष्ट्रपति ओबामा ने तिब्बत की अनूठी धार्मिक, सांस्कूतिक और भाषायी पहचान को बचाए रखने तथा चीन में तिब्बतियों के मानवाधिकार की रक्षा के प्रति पूर्र्ण सर्मथन व्यक्त किया। गौरतलब है १९९१ से अमेरिका का प्रत्येक राष्ट्रपति चीन के विरोधों के बावजूद दलाई लामा से बातचीत करता आया है और इस मुलाकात को उसी परंपरा की एक कड़ी माना जा रहा है।
राष्ट्रपति ओबामा बैठक के बाद दलाई लामा के साथ मीडिया के सामने आने का न तो साहस जुटा सके और न ही तिब्बत की स्वायत्तता का कोई जिक्र किया।
इस मुलाकात की एक और वजह हैं। राष्ट्रपति ओबामा को अपनी सत्ता के दूसरे साल में कैनेडी परिवार और डेमोक्रेटिक पार्टी के गढ़ समझे जाने वाले मैसाच्यूसेट्स की सीट पर करारी हार के बाद से अपनी भूलों का अहसास होने लगा और उसे चीन को सीना दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी सिलसिले में चीन के टायरों और इस्पात की ट्यूबों पर शुल्क जड़ना, चीन के गूगल इमेल खातों में सेंध लगाए जाने की शिकायतों की मांग करना, ताईवान को रक्षात्मक हथियार बेचने का फैसला करना और आखिरी चाल के तौर पर दलाई लामा से मिलना शामिल है। दरअसल, सांकेतिक कदमों का यह दौर अमेरिका और चीन के आपसी संबंधों में आ रही खनक से ज्यादा कुछ नहीं। आर्थिक मंदी की विभीषिका झेल चुका अमेरिका दोनों देशों के बीच टकराव का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। मुश्किल यह है कि तिब्बत जैसी समस्याओं का समाधान केवल रचनात्मक आलोचनाओं से नहीं निकल सकता।
Tuesday, March 9, 2010
भुला दिया 'आम आदमी' को
आम आदमी के नाम पर सत्ता में दूसरी बार वापसी करने वाली यूपीए सरकार ने आम बजट में 'आम आदमी' को ही भुला दिया। वित्त मंत्री ने किसानों और वेतनभोगियों को राहत देने के साथ ही साथ ढांचागत एवं सामाजिक क्षेत्रों के लिए आवंटन में वृद्धि की। लेकिन पेट्रोल, डीजल तथा अन्य
वस्तुओं के उत्पाद शुल्क में वृद्धि से महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दीं। महंगाई के मुद्दे पर बजट का बहिष्कार कर मुद्दाविहीन विपक्ष ने भी अपना फर्ज पूरा कर लिया
आध्र प्रदेश में विपक्षी दलों के विधायकों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफे का विरोध का अनूठा तरीका निकाला। टीडीपी नेता पहले तो बैलगाड़ी में फिर साइकिल पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे। उधर केरल की सड़कों पर लाल झंडे लेकर वामपंथी विरोध प्रदर्शन करते दिखाई पड़े तो दिल्ली में प्रतिरोध करने वालों को पानी की बौछारों का सामना करना पड़ा। सरकार के खिलाफ मुद्दों का सूनापन झेल रही विपक्षी पार्टियों के लिए मानो बहार आ गयी। भारत के करीब साठ साल के संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ जब पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर आम बजट का न सिर्फ बहिष्कार किया, बल्कि संसद से वाक आउट भी किया। विपक्ष के इस व्यवहार को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता। विपक्ष की मानें तो यह देश का 'आम बजट' नहीं, बल्कि 'खास बजट' है।हाल ही हुए आम चुनाव के बाद लोगों को ऐसा महसूस होने लगा था कि अब यूपीए की स्थिर सरकार आम जनता के हित को ध्यान में रखते हुए बजट पेश करेगी। लेकिन पिछले दिनों जिस महंगाई की मार से जनता त्रस्त थी उस पर इस आम बजट ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। बीते वर्ष दुनिया को मंदी की मार झेलनी पड़ी, लेकिन इस मंदी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई नहीं। लगता है हमारे राजनीतिक दलों खासकर कांग्रेस ने इससे कोई सबक हासिल नहीं किया। यही वजह है कि अपनी अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का जज्बा बजट के दौरान नहीं दिखा। आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापसी करने वाली केंद्र सरकार खाद्य वस्तुओं के मूल्य नियंत्रित कर पाने में लाचार दिखी। ऐसी आशा की जा रही थी कि वित्त मंत्री आम बजट में ऐसी कई द्घोषणाएं करेंगे जिससे बेलगाम हो चुके खाद्य पदार्थों के मूल्यों पर गिरावट न सही, स्थिरता देखी जाएगी। लेकिन आम बजट में आम आदमी के लिए ऐसा कुछ नहीं हुआ।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मध्यम वर्ग को आयकर में छूट देकर उसे महंगाई से बचाने का दिखावा करने का प्रयास तो किया, लेकिन उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के साथ पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्धि से स्पष्ट हो गया कि कोई राहत मिलने वाली नहीं। वित्त मंत्री ने माना कि मंदी से हम उबर चुके हैं। मंदी ने हमारे विकास को प्रभावित किया है। मौजूदा महंगाई के लिए उन्होंने मानसून की बेवफाई को दोषी बताया पर मनमोहन सरकार को बरी कर दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश की विकास दर ८ .५ फीसदी तक पहुंच जाएगी, लेकिन फिलहाल उनका लक्ष्य नौ फीसदी तक विकास दर हासिल करना है। वित्त मंत्री ने जहां करदाताओं को टैक्स सीमा बढ़ाकर खुश किया वहीं पेट्रोलियम पदार्थों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने के प्रस्ताव ने संसद से सड़क तक लोगों को नाराज कर दिया है। विपक्ष ने इस बजट को जन विरोधी, किसान विरोधी और गरीब विरोधी बताया।दरअसल पिछले वर्ष मंदी के दौर में सरकार ने चुनाव के मद्देनजर रियायतों का पिटारा खोल दिया। करीब साठ हजार करोड़ रुपये के कृषि राहत पैकेज की द्घोषणा की गयी। यही वजह रही कि सरकारी खजाने की स्थिति चिंताजनक हुई और राजकोषीय द्घाटा निराशाजनक होने लगा। राजकोषीय द्घाटे को नियंत्रित करने के लिए हालांकि कुछ नए कर लगाए गए हैं लेकिन अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति से साढ़े पांच प्रतिशत तक इसे ला पाना एक चुनौती है। जानकारों के मुताबिक बजट का कोई दूरगामी परिणाम नजर नहीं आता। आधारभूत ढांचे में बजट आवंटन बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में जान फूंकी जा सकती थी, पर ऐसा हुआ नहीं।एक तरफ जहां अन्य देश लगातार अपने रक्षा बजट में इजाफा कर रहे हैं, वहीं वित्त मंत्री का रक्षा बजट में कंजूसी करना समझ से परे है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का मनोबल बढ़ाने का कोई उपाय इस बजट में नहीं किया गया है। प्रशासनिक सुधार की बात तो कही गई है पर सरकारी मशीनरी के खर्चे कम करने की कोई चर्चा नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक क्षेत्र के बजट में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई है। खतरा यह है कि थोड़ा-थोड़ा धन सबको देने से सभी दूरगामी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिसका सीधा असर सकल द्घरेलू उत्पाद पर पड़ेगा और जिस राजकोषीय द्घाटे को कम करने की कोशिश की जा रही है वह और बढ़ सकता है। डीजल और पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में एक-एक रुपये प्रति लीटर की वृद्धि करने की द्घोषणा से इनके मूल्यों में ढाई रुपये प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि हो गई। इन प्रस्तावों का विपक्ष ही नहीं, बल्कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दलों ने भी भारी विरोध किया। डीजल के दाम बढ़ने से आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरत की चीजें तो महंगी होगी ही बजट प्रस्तावों से बुनियादी क्षेत्र में काम आने वाले सीमेंट, लोहा, कोयला वाहन आदि कई उद्योगों पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई पर बिना मतदान वाली चर्चा से सत्ता पक्ष को राहत मिली, लेकिन यदि समूचा विपक्ष एकजुट बना रहा तो सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि चौथी बार आम बजट पेश कर रहे प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी की तरह शेरो-शायरी का सहारा नहीं लिया और शुरू से अंत तक गंभीर बने रहे।
वस्तुओं के उत्पाद शुल्क में वृद्धि से महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दीं। महंगाई के मुद्दे पर बजट का बहिष्कार कर मुद्दाविहीन विपक्ष ने भी अपना फर्ज पूरा कर लिया
आध्र प्रदेश में विपक्षी दलों के विधायकों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफे का विरोध का अनूठा तरीका निकाला। टीडीपी नेता पहले तो बैलगाड़ी में फिर साइकिल पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे। उधर केरल की सड़कों पर लाल झंडे लेकर वामपंथी विरोध प्रदर्शन करते दिखाई पड़े तो दिल्ली में प्रतिरोध करने वालों को पानी की बौछारों का सामना करना पड़ा। सरकार के खिलाफ मुद्दों का सूनापन झेल रही विपक्षी पार्टियों के लिए मानो बहार आ गयी। भारत के करीब साठ साल के संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ जब पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर आम बजट का न सिर्फ बहिष्कार किया, बल्कि संसद से वाक आउट भी किया। विपक्ष के इस व्यवहार को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता। विपक्ष की मानें तो यह देश का 'आम बजट' नहीं, बल्कि 'खास बजट' है।हाल ही हुए आम चुनाव के बाद लोगों को ऐसा महसूस होने लगा था कि अब यूपीए की स्थिर सरकार आम जनता के हित को ध्यान में रखते हुए बजट पेश करेगी। लेकिन पिछले दिनों जिस महंगाई की मार से जनता त्रस्त थी उस पर इस आम बजट ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। बीते वर्ष दुनिया को मंदी की मार झेलनी पड़ी, लेकिन इस मंदी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई नहीं। लगता है हमारे राजनीतिक दलों खासकर कांग्रेस ने इससे कोई सबक हासिल नहीं किया। यही वजह है कि अपनी अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का जज्बा बजट के दौरान नहीं दिखा। आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापसी करने वाली केंद्र सरकार खाद्य वस्तुओं के मूल्य नियंत्रित कर पाने में लाचार दिखी। ऐसी आशा की जा रही थी कि वित्त मंत्री आम बजट में ऐसी कई द्घोषणाएं करेंगे जिससे बेलगाम हो चुके खाद्य पदार्थों के मूल्यों पर गिरावट न सही, स्थिरता देखी जाएगी। लेकिन आम बजट में आम आदमी के लिए ऐसा कुछ नहीं हुआ।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मध्यम वर्ग को आयकर में छूट देकर उसे महंगाई से बचाने का दिखावा करने का प्रयास तो किया, लेकिन उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के साथ पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्धि से स्पष्ट हो गया कि कोई राहत मिलने वाली नहीं। वित्त मंत्री ने माना कि मंदी से हम उबर चुके हैं। मंदी ने हमारे विकास को प्रभावित किया है। मौजूदा महंगाई के लिए उन्होंने मानसून की बेवफाई को दोषी बताया पर मनमोहन सरकार को बरी कर दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश की विकास दर ८ .५ फीसदी तक पहुंच जाएगी, लेकिन फिलहाल उनका लक्ष्य नौ फीसदी तक विकास दर हासिल करना है। वित्त मंत्री ने जहां करदाताओं को टैक्स सीमा बढ़ाकर खुश किया वहीं पेट्रोलियम पदार्थों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने के प्रस्ताव ने संसद से सड़क तक लोगों को नाराज कर दिया है। विपक्ष ने इस बजट को जन विरोधी, किसान विरोधी और गरीब विरोधी बताया।दरअसल पिछले वर्ष मंदी के दौर में सरकार ने चुनाव के मद्देनजर रियायतों का पिटारा खोल दिया। करीब साठ हजार करोड़ रुपये के कृषि राहत पैकेज की द्घोषणा की गयी। यही वजह रही कि सरकारी खजाने की स्थिति चिंताजनक हुई और राजकोषीय द्घाटा निराशाजनक होने लगा। राजकोषीय द्घाटे को नियंत्रित करने के लिए हालांकि कुछ नए कर लगाए गए हैं लेकिन अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति से साढ़े पांच प्रतिशत तक इसे ला पाना एक चुनौती है। जानकारों के मुताबिक बजट का कोई दूरगामी परिणाम नजर नहीं आता। आधारभूत ढांचे में बजट आवंटन बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में जान फूंकी जा सकती थी, पर ऐसा हुआ नहीं।एक तरफ जहां अन्य देश लगातार अपने रक्षा बजट में इजाफा कर रहे हैं, वहीं वित्त मंत्री का रक्षा बजट में कंजूसी करना समझ से परे है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का मनोबल बढ़ाने का कोई उपाय इस बजट में नहीं किया गया है। प्रशासनिक सुधार की बात तो कही गई है पर सरकारी मशीनरी के खर्चे कम करने की कोई चर्चा नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक क्षेत्र के बजट में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई है। खतरा यह है कि थोड़ा-थोड़ा धन सबको देने से सभी दूरगामी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिसका सीधा असर सकल द्घरेलू उत्पाद पर पड़ेगा और जिस राजकोषीय द्घाटे को कम करने की कोशिश की जा रही है वह और बढ़ सकता है। डीजल और पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में एक-एक रुपये प्रति लीटर की वृद्धि करने की द्घोषणा से इनके मूल्यों में ढाई रुपये प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि हो गई। इन प्रस्तावों का विपक्ष ही नहीं, बल्कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दलों ने भी भारी विरोध किया। डीजल के दाम बढ़ने से आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरत की चीजें तो महंगी होगी ही बजट प्रस्तावों से बुनियादी क्षेत्र में काम आने वाले सीमेंट, लोहा, कोयला वाहन आदि कई उद्योगों पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई पर बिना मतदान वाली चर्चा से सत्ता पक्ष को राहत मिली, लेकिन यदि समूचा विपक्ष एकजुट बना रहा तो सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि चौथी बार आम बजट पेश कर रहे प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी की तरह शेरो-शायरी का सहारा नहीं लिया और शुरू से अंत तक गंभीर बने रहे।
बातें हैं बातों का क्या?
करीब चौदह महीने के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच सचिव स्तर की बातचीत हुई। नतीजा वही ढाक के तीन पात, जिसकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। पाकिस्तान ने भारत की सभी मांगों को सिरे से नकारते हुए भारत को सलाह न देने की सलाह दी। कुल मिलाकर महज बातचीत के लिए बातें हुईं जिसने अपनी विश्वसनीयता खो दी। कुछ इस अंदाज में कि बातें हैं बातों का क्या? भारत-पाकिस्तान के बीच २५ फरवरी को संपन्न हुई वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मुंबई धमाकों के बाद जो वार्ता रुक गयी थी उसे एक बार फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की गई। वैसे यह बैठक आशा के अनुरूप बेनतीजा ही रही। कोशिश की जा रही थी कि पिछले चौदह माह से जो बर्फ दोनों देशों के बीच जम गयी थी उसे थोड़ा पिद्घलाया जाए। वार्ता के दौरान एक बात तो साफ तौर पर स्पष्ट हो गयी कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हुई है। भारत की ओर से जहां इस वार्ता में मुख्य रूप से पाकिस्तानी जमीन से भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवाद पर जोर दिया गया, वहीं पाकिस्तान ने बलूचिस्तान, कश्मीर और सिंधु नदी के पानी का मुद्दा उठाया। भारत सरकार ने अपने द्घरेलू दबाव को दरकिनार करके दोनों देशों के विदेश सचिव स्तर की बातचीत की पहल की थी। हालांकि आतंकवाद के दंश से पाकिस्तान भी दो चार है, मगर वह भारत के खिलाफ चरमपंथी गतिविधियां चला रहे संगठनों के प्रति इसलिए नरम रवैया अपनाए हुए है कि वह उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है।
चौदह महीने के अंतराल के बाद द्विपक्षीय वार्ता बहाल करते हुए भारत ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर तीन दस्तावेज सौंपे। इन तीनों दस्तावजों में ३४ आतंकवादियों के नाम हैं। जिनमें पाकिस्तान से सेना के रिटायर्ड मेजर इकबाल के अलावा वांछित लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद, मुजम्मिल, अबू हम्जा जैसे आतंकियों को सौंपने की मांग की। एक डोजियर में प्रमुख आतंकी इलियास कश्मीरी की गतिविधियों की जानकारी है। इसमें यह मांग की गई कि इन आतंकवादियों को सौंपा जाए और अन्य प्रभावी कदम उठाये जायें। इस बैठक में भारत ने हाल ही में हुई पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिखों की हत्या पर भी चिंता जताई। निरूपमा राव ने कहा कि हमलों से विश्वास खत्म हुआ है। उन्होंने पाकिस्तानी समकक्ष से कहा कि उनकी सरजमीं से गतिविधियां संचालित कर रहे सभी आतंकवादी समूहों को नेस्तनाबूद करना पाकिस्तान की महती जिम्मेवारी है। भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ढांचे के लगातार बने रहने और पाकिस्तानी क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से भारत के खिलाफ आतंकी हिंसा भड़काने के लिहाज से लश्कर-ए-तैएबा, जमात-उद-दावा, हिज्ब उल मुजाहिदीन आदि जैसे संगठनों की निर्बाध गतिविधियों पर अपनी चिंता जताई।
लेकिन शाम होते ही सलमान बशीर ने जिस लहजे में बात की उस तल्ख अंदाज ने गुड केमिस्ट्री की हवा निकाल दी। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने सारे एजेंडे को ही पलट कर रख दिया। उन्होंने मुंबई हमलों पर कहा कि पाकिस्तान में तो ऐसे कई सौ हमले हो चुके हैं। फिर पिछले तीन साल के दौरान पाकिस्तान में हुए आतंकी हमलों के आंकड़े भी गिना डाले। बशीर ने कश्मीर का राग तो हमेशा की तरफ अलापा ही साथ ही गैर कूटनीतिक अंदाज में भारत को नीचा दिखाने का प्रयास भी किया। साथ ही उन्होंने भारत की आतंकवाद पर चिंता को कोई तरजीह नहीं दी। आतंकी सरगना हाफिज सईद पर दिए दास्तावेज को साहित्य करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान को लेक्चर देने की जरूरत नहीं है।
महज दुनिया को दिखाने की गरज से साथ बैठ कर बात कर लेने से किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती, जब तक कि एक दूसरे की चिंताओं को समझने और सुलझाने की मंशा न हो। इसलिए जब तक पाकिस्तान अपने रुख में नरमी नहीं लाता, भारत के प्रति भरोसा पैदा नहीं करता, ऐसी वार्ताएं महज औपचारिक साबित होती रहेंगी।
चौदह महीने के अंतराल के बाद द्विपक्षीय वार्ता बहाल करते हुए भारत ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर तीन दस्तावेज सौंपे। इन तीनों दस्तावजों में ३४ आतंकवादियों के नाम हैं। जिनमें पाकिस्तान से सेना के रिटायर्ड मेजर इकबाल के अलावा वांछित लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद, मुजम्मिल, अबू हम्जा जैसे आतंकियों को सौंपने की मांग की। एक डोजियर में प्रमुख आतंकी इलियास कश्मीरी की गतिविधियों की जानकारी है। इसमें यह मांग की गई कि इन आतंकवादियों को सौंपा जाए और अन्य प्रभावी कदम उठाये जायें। इस बैठक में भारत ने हाल ही में हुई पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिखों की हत्या पर भी चिंता जताई। निरूपमा राव ने कहा कि हमलों से विश्वास खत्म हुआ है। उन्होंने पाकिस्तानी समकक्ष से कहा कि उनकी सरजमीं से गतिविधियां संचालित कर रहे सभी आतंकवादी समूहों को नेस्तनाबूद करना पाकिस्तान की महती जिम्मेवारी है। भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ढांचे के लगातार बने रहने और पाकिस्तानी क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से भारत के खिलाफ आतंकी हिंसा भड़काने के लिहाज से लश्कर-ए-तैएबा, जमात-उद-दावा, हिज्ब उल मुजाहिदीन आदि जैसे संगठनों की निर्बाध गतिविधियों पर अपनी चिंता जताई।
लेकिन शाम होते ही सलमान बशीर ने जिस लहजे में बात की उस तल्ख अंदाज ने गुड केमिस्ट्री की हवा निकाल दी। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने सारे एजेंडे को ही पलट कर रख दिया। उन्होंने मुंबई हमलों पर कहा कि पाकिस्तान में तो ऐसे कई सौ हमले हो चुके हैं। फिर पिछले तीन साल के दौरान पाकिस्तान में हुए आतंकी हमलों के आंकड़े भी गिना डाले। बशीर ने कश्मीर का राग तो हमेशा की तरफ अलापा ही साथ ही गैर कूटनीतिक अंदाज में भारत को नीचा दिखाने का प्रयास भी किया। साथ ही उन्होंने भारत की आतंकवाद पर चिंता को कोई तरजीह नहीं दी। आतंकी सरगना हाफिज सईद पर दिए दास्तावेज को साहित्य करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान को लेक्चर देने की जरूरत नहीं है।
महज दुनिया को दिखाने की गरज से साथ बैठ कर बात कर लेने से किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती, जब तक कि एक दूसरे की चिंताओं को समझने और सुलझाने की मंशा न हो। इसलिए जब तक पाकिस्तान अपने रुख में नरमी नहीं लाता, भारत के प्रति भरोसा पैदा नहीं करता, ऐसी वार्ताएं महज औपचारिक साबित होती रहेंगी।
Friday, February 12, 2010
करीब आते भारत बांग्लादेश
खालिदा जिया के समय भारत-बांग्लादेश रिश्ते में जो ठंड आ चुकी थी वो शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद पिद्घलने लगी। दरअसल, खालिदा जिया की सरकार पर कट्टरपंथी गुटों का वर्चस्व था जो कभी नहीं चाहते थे कि भारत से संबंध सुधरें। लेकिन अवामी लीग
के आते ही रिश्तों की खटास मिठास में बदलने लगी। गतिरोध और विरोध का सिलसिला टूटा। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की तीन दिवसीय यात्रा से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में एक नये अध्याय की शुरुआत दिखाई पड़ी। भारत ने भी रेड कारपेट से जिस तरह शेख हसीना का स्वागत किया है उससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत का भरोसा बांग्लादेश पर बढ़ा है। बांग्लादेश में हुई सेना बगावत के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अगर ऐसे हालात भविष्य में बने रहे तो बांग्लादेश पर राजनीतिक संकट गहरा सकता है। इसको अवामी लीग ने अच्छी तरह महसूस किया। यही वजह रही कि शेख हसीना ने पदभार संभालते ही भारत को यह भरोसा दिलाया कि बांग्लादेश को आतंकवादियों की पनाहगाह नहीं बनने दिया जाएगा। भारत आगमन पर उन्होंने भारत को यह यकीन दिलाया कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में वह अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। पिछले साल कई उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर उन्होंने यह साबित भी किया।
भारत यात्रा पर आयी शेख हसीना ने जिन महत्वपूर्ण करारों पर समझौते किए। उनमे आपराधिक मामलों में कानूनी सहायता, अंतरराष्ट्रीय और आतंकवाद संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने को लेकर हुआ। तीसरा करार कैदियों की अदला बदली के बारे में हुआ। इस करार ने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि की भूमिका तैयार कर दी है। दूसरी तरफ भारत ने बांग्लादेश को एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने की द्घोषणा की है जो किसी भी देश को एक बार में दी जाने वाली सबसे बड़ी कर्ज-राशि है। भारत ने बांग्लादेश को अपने यहां से नेपाल और भूटान तक रेल और सड़क संपर्क की सुविधा दी है। इन उपायों से दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही के नए रास्ते खुलेंगे। भारत ने बांग्लादेश से अनेक नई वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि भविष्य में इस नकारात्मक सूची को छोटा किया जा सकता है। व्यापारिक मोर्चे पर यह भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। भारत आने वाले समय में चटगांव के बंदरगाह का उपयोग कर सकेगा, जिससे समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी। लेकिन नदियों के पानी के बंटवारे और तीन बीद्घा गलियारे के सीमांकन जैसे कुछ पुराने मुद्दों पर मतभेद जस के तस बना रहा।
बेगम शेख हसीना को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर शेख हसीना भावुक दिखाई पड़ीं। उन्होंने इंदिरा गांधी को याद करते हुए उन्हें अपनी मां जैसा कहा। इंदिरा गांधी से अपनी मुलाकातों को याद कर वह भावुक हो उठीं। उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा उस कठिन समय में श्रीमती गांधी ने उन्हें पनाह दी। वह १९७६ से १९८१ तक दिल्ली में रहीं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति जैसी कृतज्ञता दिखाई, वो दोतरफा रिश्तों के बीच बेहतर संभावना का परिचायक है। यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच हुए इन समझौतों को जानकार रूटीन कूटनीति से आगे आपसी सद्भाव और शांति के क्षेत्र में एक बड़ी पहल मान रहे हैं। भारत दौरे पर आयी शेख हसीना ने कहा कि वो भारत के साथ बेहतर रिश्ते चाहती हैं। ताकि दक्षिण एशिया में स्थायी रूप से शांति हो सके। उन्होंने कहा भारत से हमारा रिश्ता पुराना है। मुक्ति आंदोलन में भारत ने हमारे लोगों की न केवल मदद की बल्कि हमारे संद्घर्ष में भी साथ दिया। उन्होंने कहा कि हम दोस्ती और सहयोग चाहते हैं ताकि अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी का सामना कर सकें। हम गरीबी मुक्त, शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की चाहत रखते हैं। मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की भलाई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश के निर्माण के मात्र चार वर्ष बाद ही १९७५ में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गयी थी। तत्कालीन सैन्य विद्रोह के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। निर्वासित जीवन उन्होंने भारत में ही बिताया। अवामी लीग दुबारा १९९६ में सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार अल्प मत की थी। इस बार जब बांग्लादेश की अवाम ने अवामी लीग को पूर्ण बहुमत दिया तो शेख हसीना भ्ाी भारत के साथ अपने पुराने संबंधों को सुधारने के प्रयास में लग गयीं। भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश नए संकेत पहले ही दे चुका है। जानकारों की मानें तो दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते बड़ा रोल निभा सकते हैं।
के आते ही रिश्तों की खटास मिठास में बदलने लगी। गतिरोध और विरोध का सिलसिला टूटा। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की तीन दिवसीय यात्रा से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में एक नये अध्याय की शुरुआत दिखाई पड़ी। भारत ने भी रेड कारपेट से जिस तरह शेख हसीना का स्वागत किया है उससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत का भरोसा बांग्लादेश पर बढ़ा है। बांग्लादेश में हुई सेना बगावत के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अगर ऐसे हालात भविष्य में बने रहे तो बांग्लादेश पर राजनीतिक संकट गहरा सकता है। इसको अवामी लीग ने अच्छी तरह महसूस किया। यही वजह रही कि शेख हसीना ने पदभार संभालते ही भारत को यह भरोसा दिलाया कि बांग्लादेश को आतंकवादियों की पनाहगाह नहीं बनने दिया जाएगा। भारत आगमन पर उन्होंने भारत को यह यकीन दिलाया कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में वह अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। पिछले साल कई उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर उन्होंने यह साबित भी किया।
भारत यात्रा पर आयी शेख हसीना ने जिन महत्वपूर्ण करारों पर समझौते किए। उनमे आपराधिक मामलों में कानूनी सहायता, अंतरराष्ट्रीय और आतंकवाद संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने को लेकर हुआ। तीसरा करार कैदियों की अदला बदली के बारे में हुआ। इस करार ने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि की भूमिका तैयार कर दी है। दूसरी तरफ भारत ने बांग्लादेश को एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने की द्घोषणा की है जो किसी भी देश को एक बार में दी जाने वाली सबसे बड़ी कर्ज-राशि है। भारत ने बांग्लादेश को अपने यहां से नेपाल और भूटान तक रेल और सड़क संपर्क की सुविधा दी है। इन उपायों से दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही के नए रास्ते खुलेंगे। भारत ने बांग्लादेश से अनेक नई वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि भविष्य में इस नकारात्मक सूची को छोटा किया जा सकता है। व्यापारिक मोर्चे पर यह भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। भारत आने वाले समय में चटगांव के बंदरगाह का उपयोग कर सकेगा, जिससे समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी। लेकिन नदियों के पानी के बंटवारे और तीन बीद्घा गलियारे के सीमांकन जैसे कुछ पुराने मुद्दों पर मतभेद जस के तस बना रहा।
बेगम शेख हसीना को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर शेख हसीना भावुक दिखाई पड़ीं। उन्होंने इंदिरा गांधी को याद करते हुए उन्हें अपनी मां जैसा कहा। इंदिरा गांधी से अपनी मुलाकातों को याद कर वह भावुक हो उठीं। उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा उस कठिन समय में श्रीमती गांधी ने उन्हें पनाह दी। वह १९७६ से १९८१ तक दिल्ली में रहीं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति जैसी कृतज्ञता दिखाई, वो दोतरफा रिश्तों के बीच बेहतर संभावना का परिचायक है। यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच हुए इन समझौतों को जानकार रूटीन कूटनीति से आगे आपसी सद्भाव और शांति के क्षेत्र में एक बड़ी पहल मान रहे हैं। भारत दौरे पर आयी शेख हसीना ने कहा कि वो भारत के साथ बेहतर रिश्ते चाहती हैं। ताकि दक्षिण एशिया में स्थायी रूप से शांति हो सके। उन्होंने कहा भारत से हमारा रिश्ता पुराना है। मुक्ति आंदोलन में भारत ने हमारे लोगों की न केवल मदद की बल्कि हमारे संद्घर्ष में भी साथ दिया। उन्होंने कहा कि हम दोस्ती और सहयोग चाहते हैं ताकि अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी का सामना कर सकें। हम गरीबी मुक्त, शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की चाहत रखते हैं। मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की भलाई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश के निर्माण के मात्र चार वर्ष बाद ही १९७५ में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गयी थी। तत्कालीन सैन्य विद्रोह के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। निर्वासित जीवन उन्होंने भारत में ही बिताया। अवामी लीग दुबारा १९९६ में सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार अल्प मत की थी। इस बार जब बांग्लादेश की अवाम ने अवामी लीग को पूर्ण बहुमत दिया तो शेख हसीना भ्ाी भारत के साथ अपने पुराने संबंधों को सुधारने के प्रयास में लग गयीं। भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश नए संकेत पहले ही दे चुका है। जानकारों की मानें तो दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते बड़ा रोल निभा सकते हैं।
राज को राज
श्रीलंका में संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम
चौंकाने वाला नहीं रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे जीतेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। राष्ट्रपति पद के लिए करीब २२ उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और जनरल फोनसेका के बीच ही था। वैसे चुनाव का मुख्य मुद्दा लिट्टे के साथ चल रहे २६ साल पुराने गृहयुद्ध को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाने का ही रहा। ऐसे में आम लोगों की अपेक्षाएं राजपक्षे से ज्यादा थीं। यही कारण उनकी जीत का भी बना। गृहयुद्ध की विभीषिका झेल चुके श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए लोगों ने राजपक्षे के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इन सब के बीच नई सरकार के सामने अभी कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। मसलन सैन्यवाद, मानवाधिकारों का उल्लंद्घन, प्रेस की आजादी, अंधराष्ट्रवाद तथा तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकार।जिस पैमाने पर राजपक्षे को जीत हासिल हासिल हुई है उससे एक बात स्पष्ट है कि अब श्रीलंका में लंबे समय तक राजनीतिक स्थायित्व बना रहेगा। चुनावों में मिली जीत से जानकारों का मानना है कि वहां के हालात में और सुधार आयेगा। ऐसे में राजपक्षे को श्रीलंका में व्याप्त भय के माहौल को खत्म करने के लिए एक अवसर प्राप्त हो गया है। लंबे समय तक चली तमिल और सिंहली खूनी जंग ने श्रीलंका की राजनीति और आर्थिक स्थिति की चूलें हिला दी थीं। देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए राजपक्षे को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्रीलंका अपने हिंसात्मक इतिहास से उबरने में सफल रहेगा। साथ ही ढाई लाख तमिलों को पुनर्वास कैंपों से बाहर निकालकर वापस मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगा।
इस बीच श्रीलंका के रक्षा सचिव का कहना है कि सरकार राष्ट्रपति चुनाव में हार चुके जनरल सनथ फोनसेका के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रही है। वैसे श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनाव परिणामों के बाद हत्या का पुराना इतिहास रहा है। इसे देखते हुए सेना कमांडर फोनसेका ने अपनी जान के खतरे की आशंका जताई है। सैनिकों से द्घिरे एक होटल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जनरल फोनसेना ने कहा कि चुनाव में धांधली हुई है और सरकार उन्हें जान से मरवाने की कोशिश कर रही है। इस बीच सरकार का कहना है कि जनरल होटल छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें उन आरोपों के नतीजों का सामना करना होगा जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान लगाए थे। चुनाव में जनरल को पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग समेत कुछ विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था।
दरअसल राष्ट्रपति राजपक्षे को जनरल फोनसेका की तरफ से दी गई चुनौती कोई सामान्य चुनौती नहीं थी। यह सेना के शीर्ष नेतृत्व का नागरिकों के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव था। अगर यह टकराव आगे भी बना रहा तो श्रीलंका की शांति को नया खतरा हो सकता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह स्थिति किसी सैन्य बगावत की तरफ जाएगी ऐसा नहीं लगता है। लेकिन राजपक्षे की छवि को देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि टकराव का खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए सवाल महज चुनाव जीतने का ही नहीं है। सवाल लोकतंत्र का है, श्रीलंका के अस्तित्व और आगे की रणनीति, कूटनीति का है। गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी श्रीलंका सामान्य नहीं हुआ है। असली चुनौतियां अभी बाकी हैं। ऐसे में भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे पर लगी हैं।जहां तक भारत-श्रीलंका के संबंधों का सवाल है तो कुल मिलाकर अभी तक यह संबंध संतोषप्रद ही रहा है। लेकिन लिट्टे के खात्मे के लिए जिस प्रकार श्रीलंका ने चीन और पाकिस्तान की मदद ली वह भारत के हित में नहीं जाता। लिट्टे के खिलाफ अभियान के दौरान चीन और पाकिस्तान की सैन्य भूमिका श्रीलंका में बढ़ी है। जो भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका में होने वाले परिवर्तनों का भारत पर भी असर पड़ता है। गृहयुद्ध के कारण चरमराई श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए व्यापार के मामले में भारत को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने होंगे। श्रीलंका अभी भी भारत पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे में उसे आर्थिक और राजनैतिक पहल के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।
चौंकाने वाला नहीं रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे जीतेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। राष्ट्रपति पद के लिए करीब २२ उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और जनरल फोनसेका के बीच ही था। वैसे चुनाव का मुख्य मुद्दा लिट्टे के साथ चल रहे २६ साल पुराने गृहयुद्ध को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाने का ही रहा। ऐसे में आम लोगों की अपेक्षाएं राजपक्षे से ज्यादा थीं। यही कारण उनकी जीत का भी बना। गृहयुद्ध की विभीषिका झेल चुके श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए लोगों ने राजपक्षे के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इन सब के बीच नई सरकार के सामने अभी कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। मसलन सैन्यवाद, मानवाधिकारों का उल्लंद्घन, प्रेस की आजादी, अंधराष्ट्रवाद तथा तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकार।जिस पैमाने पर राजपक्षे को जीत हासिल हासिल हुई है उससे एक बात स्पष्ट है कि अब श्रीलंका में लंबे समय तक राजनीतिक स्थायित्व बना रहेगा। चुनावों में मिली जीत से जानकारों का मानना है कि वहां के हालात में और सुधार आयेगा। ऐसे में राजपक्षे को श्रीलंका में व्याप्त भय के माहौल को खत्म करने के लिए एक अवसर प्राप्त हो गया है। लंबे समय तक चली तमिल और सिंहली खूनी जंग ने श्रीलंका की राजनीति और आर्थिक स्थिति की चूलें हिला दी थीं। देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए राजपक्षे को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्रीलंका अपने हिंसात्मक इतिहास से उबरने में सफल रहेगा। साथ ही ढाई लाख तमिलों को पुनर्वास कैंपों से बाहर निकालकर वापस मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगा।
इस बीच श्रीलंका के रक्षा सचिव का कहना है कि सरकार राष्ट्रपति चुनाव में हार चुके जनरल सनथ फोनसेका के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रही है। वैसे श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनाव परिणामों के बाद हत्या का पुराना इतिहास रहा है। इसे देखते हुए सेना कमांडर फोनसेका ने अपनी जान के खतरे की आशंका जताई है। सैनिकों से द्घिरे एक होटल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जनरल फोनसेना ने कहा कि चुनाव में धांधली हुई है और सरकार उन्हें जान से मरवाने की कोशिश कर रही है। इस बीच सरकार का कहना है कि जनरल होटल छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें उन आरोपों के नतीजों का सामना करना होगा जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान लगाए थे। चुनाव में जनरल को पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग समेत कुछ विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था।
दरअसल राष्ट्रपति राजपक्षे को जनरल फोनसेका की तरफ से दी गई चुनौती कोई सामान्य चुनौती नहीं थी। यह सेना के शीर्ष नेतृत्व का नागरिकों के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव था। अगर यह टकराव आगे भी बना रहा तो श्रीलंका की शांति को नया खतरा हो सकता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह स्थिति किसी सैन्य बगावत की तरफ जाएगी ऐसा नहीं लगता है। लेकिन राजपक्षे की छवि को देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि टकराव का खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए सवाल महज चुनाव जीतने का ही नहीं है। सवाल लोकतंत्र का है, श्रीलंका के अस्तित्व और आगे की रणनीति, कूटनीति का है। गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी श्रीलंका सामान्य नहीं हुआ है। असली चुनौतियां अभी बाकी हैं। ऐसे में भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे पर लगी हैं।जहां तक भारत-श्रीलंका के संबंधों का सवाल है तो कुल मिलाकर अभी तक यह संबंध संतोषप्रद ही रहा है। लेकिन लिट्टे के खात्मे के लिए जिस प्रकार श्रीलंका ने चीन और पाकिस्तान की मदद ली वह भारत के हित में नहीं जाता। लिट्टे के खिलाफ अभियान के दौरान चीन और पाकिस्तान की सैन्य भूमिका श्रीलंका में बढ़ी है। जो भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका में होने वाले परिवर्तनों का भारत पर भी असर पड़ता है। गृहयुद्ध के कारण चरमराई श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए व्यापार के मामले में भारत को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने होंगे। श्रीलंका अभी भी भारत पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे में उसे आर्थिक और राजनैतिक पहल के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।
Thursday, January 7, 2010
क्या तेलंगाना बन सकेगा
चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन से द्घबराकर केन्द्र सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य देने की द्घोषणा तो कर दी, लेकिन सरकार की यह द्घोषणा आग में द्घी डालने जैसी रही। जहां एक ओर बहुत से कांग्रेसी विधायक और सांसद सरकार के इस फैसले से असंतुष्ट दिखे वहीं दूसरी ओर विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, गोरखालैंड, बोडोलैंड, मिथिलांचल सहित अन्य कई छोटे राज्यों के गठन की मांग को बल मिल गया है। वैसे आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना का गठन भी आसान नहीं होगा। सबसे अहम सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। राजधानी के प्रश्न पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। बंटवारे की लहर आंध्र प्रदेश तक ही समिति रह जाएगी ऐसा मुमकिन नहीं है। पूरे भारतवर्ष में दर्जन भर अलग राज्य बनाने के लिए आवाजें उठनी शुरू हो गयी हैं। दरअसल इसमें कोई शक नहीं कि यदि राव को कुछ हो जाता तो इस बार १९५२ के श्रीरामुलु कांड से भी भयंकर चक्रवात आंध्र को द्घेर लेता।
वर्तमान में जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जा रहा है, उसमें आंध्र प्रदेश के २३ जिलों में से १० जिले आते हैं। मूल रूप से यह निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा है। पिछले दिनों जिस तरह आंध्र प्रदेश का राजनीतिक तापमान दिल्ली के गलियारों में महसूस किया गया उसकी पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। दरअसल यह आंदोलन छह दशक पुराना है। चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया की अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरुआत की थी। उस समय इसका उद्देश्य भूमिहीनों को भूपति बनाना था। बाद में इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथों में आ गई। शुरूआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठी चार्ज में साढ़े तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे। एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा दिया था।
दरअसल कांग्रेस ने कभी नहीं सोचा था कि तेलंगाना का मुद्दा कभी इतना गम्भीर हो जाएगा। कांग्रेस अगर अपने २००४ के वादे के मुताबिक अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण करवा देती तो शेष प्रांतों में अलगाव की आग इतनी तेजी से नहीं भड़कती। आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत ने इस मुद्दे की हवा निकाल दी थी। आंध्र में मजबूत रेड्डी की सरकार ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाकर 'तेलंगाना राष्ट्र समिति' को राजनीतिक हाशिए पर सरका दिया। लेकिन चंद्रशेखर राव के अनशन ने उन्हें महानायक बना दिया। आंध्र की वर्तमान स्थिति ने गृहमंत्री चिदंबरम की द्घोषणा को अधर में लटका दिया है। यदि कांग्रेस का नेतृत्व अपने विधायकों और सांसदों के साथ जोर जबर्दस्ती करता है तो कांग्रेस के सामने नयी चुनौतियां आ सकती हैं। हालांकि तेलंगाना को स्वीकार करने में गलत कुछ नहीं है लेकिन जिन परिस्थितियों में इसे स्वीकार किया गया उस पर जरूर जानकारों को आपत्ति है। जानकारों का कहना है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सरकार ने द्घुटने टेक दिये हैं।
अलग तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश में सड़क से लेकर सदन तक द्घमासान मचा है। आंध्र प्रदेश में जहां जनजीवन बेहाल रहा, वहीं विधायकों के इस्तीफों की बाढ़ आ गयी है। १२९ विधायकों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इनमें ७० कांग्रेस, ३८ तदेपा और १५ प्रजा राज्यम पार्टी के विधायक हैं। इस बीच विधानसभा अध्यक्ष एन कुमार रेड्डी ने विधायकों के इस्तीफे से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर सभी पार्टियों से राय मांगी है कि सदन का कामकाज जारी रखा जाए या नहीं। इस बीच रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपने पिता का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं और अपने समर्थकों से कह रहे हैं कि तेलंगाना व्यवहार्य नहीं है। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। यह शहर किसके साथ जाएगा। सबकी आंखें हैदराबाद की समृद्धि पर टिकी हुई हैं। इसकी वजह से भी तेलंगाना के गठन में देरी हो सकती है। अगर यह शहर तेलंगाना को मिलता है, तो आंध्र प्रदेश पहचानने योग्य नहीं रह जाएगा। सवाल उठता है कि अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चन्द्रशेखर राव की मांग के आगे मजबूर क्यों होना पड़ा।
राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में राव को पीछे आंध्र के रेड्डी समुदाय की ताकत थी। वाईएस रेड्डी की मृत्यु के बाद रेड्डी को मुख्यमंत्री न बनाकर कांग्रेस ने रेड्डियों को नाराज कर दिया। इसलिए रेड्डियों ने कांग्रेस को इस तरह सबक सीखाया है।उधर तेलंगाना को पृथक राज्य बनाए जाने की द्घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी छोटे राज्यों के गठन की वकालत की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर बुंदेलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश) को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए कहा है कि बसपा छोटे राज्यों के पक्ष में है। तेलंगाना के बाद पूर्वोत्तर में भी कई राज्यों के गठन की मांग बुलंद हो गई है। केन्द्र में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी 'बोडोलैण्ड पीपुल्स फ्रंट' ने फिर से बोडोलैंड बनाने की मुखर मांग की है। ऑल असम दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमासा पीपुल्स काउंसिल ने दिमासा जनजातियों को लेकर अलग दिमाराजी राज्य के गठन की मांग उठाई है। इस बीच गोरखालैंड के गठन की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है।
वर्ष १९९२ में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद वाकई देश में काफी तेजी से विकास हुआ। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी दिखा। इसे हम विगत दो दशकों में पैदा हुई आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ सब्र के बांध का टूटना मान सकते हैं। हालांकि भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग नेहरू युग में उठी थी। दरअसल छोटे राज्यों का निर्माण क्षेत्रीय दलों के हित ज्यादा साधता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनता को उकसा रहे हैं। इसलिए यह अति आवश्यक है कि छोटे राज्यों की उभरती मांगों पर एक दीर्द्घकालिक योजना के साथ कार्य किया जाए। इस विचार की भी हवा निकल चुकी है कि छोटे राज्य प्रशासन के लिहाज से बेहतर साबित होते हैं। झारखंड उदाहरण के रूप में सामने है।
वर्तमान में जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जा रहा है, उसमें आंध्र प्रदेश के २३ जिलों में से १० जिले आते हैं। मूल रूप से यह निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा है। पिछले दिनों जिस तरह आंध्र प्रदेश का राजनीतिक तापमान दिल्ली के गलियारों में महसूस किया गया उसकी पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। दरअसल यह आंदोलन छह दशक पुराना है। चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया की अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरुआत की थी। उस समय इसका उद्देश्य भूमिहीनों को भूपति बनाना था। बाद में इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथों में आ गई। शुरूआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठी चार्ज में साढ़े तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे। एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा दिया था।
दरअसल कांग्रेस ने कभी नहीं सोचा था कि तेलंगाना का मुद्दा कभी इतना गम्भीर हो जाएगा। कांग्रेस अगर अपने २००४ के वादे के मुताबिक अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण करवा देती तो शेष प्रांतों में अलगाव की आग इतनी तेजी से नहीं भड़कती। आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत ने इस मुद्दे की हवा निकाल दी थी। आंध्र में मजबूत रेड्डी की सरकार ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाकर 'तेलंगाना राष्ट्र समिति' को राजनीतिक हाशिए पर सरका दिया। लेकिन चंद्रशेखर राव के अनशन ने उन्हें महानायक बना दिया। आंध्र की वर्तमान स्थिति ने गृहमंत्री चिदंबरम की द्घोषणा को अधर में लटका दिया है। यदि कांग्रेस का नेतृत्व अपने विधायकों और सांसदों के साथ जोर जबर्दस्ती करता है तो कांग्रेस के सामने नयी चुनौतियां आ सकती हैं। हालांकि तेलंगाना को स्वीकार करने में गलत कुछ नहीं है लेकिन जिन परिस्थितियों में इसे स्वीकार किया गया उस पर जरूर जानकारों को आपत्ति है। जानकारों का कहना है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सरकार ने द्घुटने टेक दिये हैं।
अलग तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश में सड़क से लेकर सदन तक द्घमासान मचा है। आंध्र प्रदेश में जहां जनजीवन बेहाल रहा, वहीं विधायकों के इस्तीफों की बाढ़ आ गयी है। १२९ विधायकों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इनमें ७० कांग्रेस, ३८ तदेपा और १५ प्रजा राज्यम पार्टी के विधायक हैं। इस बीच विधानसभा अध्यक्ष एन कुमार रेड्डी ने विधायकों के इस्तीफे से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर सभी पार्टियों से राय मांगी है कि सदन का कामकाज जारी रखा जाए या नहीं। इस बीच रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपने पिता का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं और अपने समर्थकों से कह रहे हैं कि तेलंगाना व्यवहार्य नहीं है। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। यह शहर किसके साथ जाएगा। सबकी आंखें हैदराबाद की समृद्धि पर टिकी हुई हैं। इसकी वजह से भी तेलंगाना के गठन में देरी हो सकती है। अगर यह शहर तेलंगाना को मिलता है, तो आंध्र प्रदेश पहचानने योग्य नहीं रह जाएगा। सवाल उठता है कि अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चन्द्रशेखर राव की मांग के आगे मजबूर क्यों होना पड़ा।
राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में राव को पीछे आंध्र के रेड्डी समुदाय की ताकत थी। वाईएस रेड्डी की मृत्यु के बाद रेड्डी को मुख्यमंत्री न बनाकर कांग्रेस ने रेड्डियों को नाराज कर दिया। इसलिए रेड्डियों ने कांग्रेस को इस तरह सबक सीखाया है।उधर तेलंगाना को पृथक राज्य बनाए जाने की द्घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी छोटे राज्यों के गठन की वकालत की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर बुंदेलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश) को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए कहा है कि बसपा छोटे राज्यों के पक्ष में है। तेलंगाना के बाद पूर्वोत्तर में भी कई राज्यों के गठन की मांग बुलंद हो गई है। केन्द्र में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी 'बोडोलैण्ड पीपुल्स फ्रंट' ने फिर से बोडोलैंड बनाने की मुखर मांग की है। ऑल असम दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमासा पीपुल्स काउंसिल ने दिमासा जनजातियों को लेकर अलग दिमाराजी राज्य के गठन की मांग उठाई है। इस बीच गोरखालैंड के गठन की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है।
वर्ष १९९२ में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद वाकई देश में काफी तेजी से विकास हुआ। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी दिखा। इसे हम विगत दो दशकों में पैदा हुई आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ सब्र के बांध का टूटना मान सकते हैं। हालांकि भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग नेहरू युग में उठी थी। दरअसल छोटे राज्यों का निर्माण क्षेत्रीय दलों के हित ज्यादा साधता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनता को उकसा रहे हैं। इसलिए यह अति आवश्यक है कि छोटे राज्यों की उभरती मांगों पर एक दीर्द्घकालिक योजना के साथ कार्य किया जाए। इस विचार की भी हवा निकल चुकी है कि छोटे राज्य प्रशासन के लिहाज से बेहतर साबित होते हैं। झारखंड उदाहरण के रूप में सामने है।
क्या यही इंसाफ है बस छह माह
आखिरकार १९ सालों के बाद रूचिका को इंसाफ मिला। लेकिन देरी से मिलने वाले इस इंसाफ पर एक लंबी बहस ने जन्म ले लिया है, आखिर एक संवेदनशील मामले में इतनी देर क्यों हुई। ऐसे कई सामाजिक संगठन,बुद्धिजीवी, पत्रकारिता जगत के लोग और अन्य वर्ग मुखर होकर सामने आने लगे हैं। रूचिका एक मात्र ऐसी पीड़िता नहीं हैं देश भर में, न जाने कितनी रूचिकाएं हैं जो किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती हैं। राठौर को हुई छह महीने की सजा काफी है या कम, इस पर भी बहस छिड़ गयी है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कानून के जानकार कानून का उपयोग अपने हित में करने से कभी नहीं चूकते। राठौर के मामले में राजनीतिक पार्टियां भी अपने को पाक साफ दामन नहीं कह सकतीं। राजनीतिक दल भी उतने ही दोषी हैं जितने कि राठौर।
चंडीगढ़ की सीबीआई की विशेष अदालत ने हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डी जी पी) एसपीएस राठौर को १४ वर्षीय टेनिस खिलाड़ी रूचिका से छेड़छाड़ का दोषी करार देते हुए उन्हें सजा सुनाई। अदालत ने राठौर को छह महीने की कैद और एक हजार रूपये जुर्माना भरने का आदेश दिया। जुर्माना न अदा करने की हालत में राठौर को एक माह की सजा और हो सकती है।१४ वषीय किशोरी रूचिका गिराहोत्रा एक टेनिस खिलाड़ी थी। १२ अगस्त १९९० को वह राठौर के द्वारा छेड़छाड़ का शिकार हुई। राठौर उस समय हरियाणा में आई जी और हरियाणा टेनिस एसोशियेशन के अध्यक्ष थे। छेड़छाड़ के करीब तीन साल बाद रूचिका ने १९९३ में जहर पीकर आत्महत्या कर ली थी। रूचिका ने इस छेड़खानी की बात अपने पिता को नहीं बताई थी। लेकिन उसकी सहेली ने राठौर द्वारा रूचिका के उत्पीड़न को देखा और पूरा मामला अपने परिवार वालों को बताया था। मधुप्रकाश १९९७ में इस मामले को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय में लेकर गई। उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने यह मामला दर्ज किया था। १९९८ में यह पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।मुकदमें के दौरान बार-बार मजिस्ट्रेट बदले गए और गवाहों को प्रभावित करने की लगातार प्रयास भी किये गये। इस बीच राठौर हरियाणा के पुलिस महानिदेशक बन गए । वर्ष २००२ में राठौर डीजीपी के पद से सेवानिवृत हो गए। सितंबर २००२ में रूचिका के भाई ने भी आत्महत्या कर ली थी।
रूचिका की सहेली और इस द्घटना की एकमात्र गवाह अराधना गुप्ता इस मामले का फैसला सुनने के लिए आस्ट्रेलिया से अपने पति के साथ चंडीगढ़ आई थी। आराधना, रूचिका की सहयोगी टेनिस खिलाड़ी और पड़ोसी थी। इस द्घटना के वक्त वह मात्र १३ साल की थी। फैसला सुनाए जाते वक्त अदालत में राठौर और उनकी वकील पत्नी आभा राठौर भी उपस्थित थे। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रथम दृष्टया राठौर के खिलाफ मामला बनता है। मधु ने पत्रकारों से हुई बात चीत में बताया कि वह खुश है कि राठौर को छह महीने के कडे़ कारावास की सजा सुनाई गई है। लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी है कि अदालत को मामले में फैसला सुनाने में इतना अधिक समय लगा।राठौर शायद ऐसे पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं जिन्हें सजा सुनाई गयी है। इससे पूर्व शिवानी भटनागर हत्याकांड में रविकांत शर्मा को अभियुक्त बनाया गया। पूर्व डीजीपी रमेश सहगल को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा गैर कानूनी रूप से हिरासत में रखने के आरोप में आईपीएस अधिकारी अनिल डाबरा को कैद की सजा सुनाई गयी थी। एक नाबालिग को गैरकानूनी हिरासत में रखने के आरोप में एक अन्य आईपीएस अधिकारी एम . एस .अहलावत भी सुप्रीम कोर्ट से दण्डित हो चुके हैं। पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक के पीएस गिल पर भी एक आई ए एस महिला अधिकारी से छेड़छाड़ का आरोप लग चुका है।आनंद प्रकाश और उनके परिवार ने जो भी किया यकीनन वह काबिले तारीफ है। उन्होंने जो हिम्मत दिखाई उससे कई लोगों को हौसला मिलेगा। प्रकाश परिवार ने जो मिसाल कायम की है वह आने वाली नई नस्लों के
चंडीगढ़ की सीबीआई की विशेष अदालत ने हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डी जी पी) एसपीएस राठौर को १४ वर्षीय टेनिस खिलाड़ी रूचिका से छेड़छाड़ का दोषी करार देते हुए उन्हें सजा सुनाई। अदालत ने राठौर को छह महीने की कैद और एक हजार रूपये जुर्माना भरने का आदेश दिया। जुर्माना न अदा करने की हालत में राठौर को एक माह की सजा और हो सकती है।१४ वषीय किशोरी रूचिका गिराहोत्रा एक टेनिस खिलाड़ी थी। १२ अगस्त १९९० को वह राठौर के द्वारा छेड़छाड़ का शिकार हुई। राठौर उस समय हरियाणा में आई जी और हरियाणा टेनिस एसोशियेशन के अध्यक्ष थे। छेड़छाड़ के करीब तीन साल बाद रूचिका ने १९९३ में जहर पीकर आत्महत्या कर ली थी। रूचिका ने इस छेड़खानी की बात अपने पिता को नहीं बताई थी। लेकिन उसकी सहेली ने राठौर द्वारा रूचिका के उत्पीड़न को देखा और पूरा मामला अपने परिवार वालों को बताया था। मधुप्रकाश १९९७ में इस मामले को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय में लेकर गई। उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने यह मामला दर्ज किया था। १९९८ में यह पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।मुकदमें के दौरान बार-बार मजिस्ट्रेट बदले गए और गवाहों को प्रभावित करने की लगातार प्रयास भी किये गये। इस बीच राठौर हरियाणा के पुलिस महानिदेशक बन गए । वर्ष २००२ में राठौर डीजीपी के पद से सेवानिवृत हो गए। सितंबर २००२ में रूचिका के भाई ने भी आत्महत्या कर ली थी।
रूचिका की सहेली और इस द्घटना की एकमात्र गवाह अराधना गुप्ता इस मामले का फैसला सुनने के लिए आस्ट्रेलिया से अपने पति के साथ चंडीगढ़ आई थी। आराधना, रूचिका की सहयोगी टेनिस खिलाड़ी और पड़ोसी थी। इस द्घटना के वक्त वह मात्र १३ साल की थी। फैसला सुनाए जाते वक्त अदालत में राठौर और उनकी वकील पत्नी आभा राठौर भी उपस्थित थे। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रथम दृष्टया राठौर के खिलाफ मामला बनता है। मधु ने पत्रकारों से हुई बात चीत में बताया कि वह खुश है कि राठौर को छह महीने के कडे़ कारावास की सजा सुनाई गई है। लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी है कि अदालत को मामले में फैसला सुनाने में इतना अधिक समय लगा।राठौर शायद ऐसे पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं जिन्हें सजा सुनाई गयी है। इससे पूर्व शिवानी भटनागर हत्याकांड में रविकांत शर्मा को अभियुक्त बनाया गया। पूर्व डीजीपी रमेश सहगल को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा गैर कानूनी रूप से हिरासत में रखने के आरोप में आईपीएस अधिकारी अनिल डाबरा को कैद की सजा सुनाई गयी थी। एक नाबालिग को गैरकानूनी हिरासत में रखने के आरोप में एक अन्य आईपीएस अधिकारी एम . एस .अहलावत भी सुप्रीम कोर्ट से दण्डित हो चुके हैं। पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक के पीएस गिल पर भी एक आई ए एस महिला अधिकारी से छेड़छाड़ का आरोप लग चुका है।आनंद प्रकाश और उनके परिवार ने जो भी किया यकीनन वह काबिले तारीफ है। उन्होंने जो हिम्मत दिखाई उससे कई लोगों को हौसला मिलेगा। प्रकाश परिवार ने जो मिसाल कायम की है वह आने वाली नई नस्लों के
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