Friday, December 11, 2009

क्या इरान -अमेरिका करीब आ सकेगे

अमेरिका वर्तमान में इराक और अफगानिस्तान में बुरी तरह फंसा हुआ है। वह यहां से किसी तरह नाक बचाकर निकलना चाहता है। ऐसे में उसे आज ईरान की जरूरत महसूस हो रही
है। यही वजह है कि एक वर्ष पहले तक ईरान के एटमी ठिकानों को तबाह करने की धमकी देने वाला अमेरिका आज ईरान से दोस्ती का राग अलाप रहा है। ईरान के प्रति अमेरिका की पुरानी दुश्मनी को देखते हुए ईरानी नेतृत्व उस पर विश्वास करने में हिचक रहा है
रान के मामले में अमेरिका क्या सोचता है, अमेरिकी नीतियां क्या हैं, यह बात किसी से छुपी नहीं है। ईरान के एटमी मंसूबों को रूस के समर्थन के मद्देनजर अमेरिका ने अपनी जो कूटनीति तय की, उसमें फ्रांस और जर्मनी का उकसावा भी शामिल है। इजराईल की परमाणु क्षमता ईरान के लिए अस्तित्व की समस्या है। ऐसे में वाशिंगटन में बैठे बूस रिडल जैसे नीति निर्माताओं के बयान ईरानियों को मददगार प्रतीत हो रहे हैं। रिडल का कहना है कि मध्य पूर्व में एटमी मसलों पर दोहरे मापदंड अपना कर शांति हासिल नहीं की जा सकती। इसलिए जेनेवा हो या वियना, सभी प्रयासों में इजराईल के परमाणु हथियारों को सामने लाने की कोशिश हो रही है। १२ जून को पूर्व राष्ट्रपति हाशमी रफसंजानी और राष्ट्रपति चुनाव में पराजित मीर हुसैन मुसावी ने जो जोरदार प्रदर्शन किए थे, उसके बाद से ईरान में तेजी से हुए बदलावों को आंकना दिलचस्प है।
अविश्वास और टकराव के लंबे दौर के बाद अमेरिका अब ईरान के साथ दोस्ती चाहता है। बीते ४ नवंबर को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफ कर दिया कि अमेरिका लगातार शक, अविश्वास और टकराव के इस अतीत से आगे जाना चाहता है और परस्पर हितों और सम्मान के आधार पर इस्लामी गणराज्य ईरान के साथ रिश्ता बनाना चाहता है। ओबामा का यह बयान ईरान की मुख्य भाषा फारसी में भी जारी किया गया। ओबामा ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। उन्होंने ईरान में हुए आतंकी हमलों की भी भर्त्सना की। अपने बयान में शांतिपूर्ण परमाणु शक्ति के रूप में ईरान के अंतरराष्ट्रीय अधिकार का सम्मान करने की बात कही। विश्व समुदाय के अन्य देशों के साथ अपने विश्वास बहाली के प्रयासों के प्रति अपनी इच्छा प्रकट की। ओबामा ने, ईरान के अनुरोध पर ईरानी जनता की चिकित्सीय जरूरतों और अन्य मदद को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रस्ताव को स्वीकार करने की भी बात कही। उन्होंने माना कि हर राष्ट्र की तरह ईरान अपने दायित्वों को पूरा करता है तो वह उसे समृद्धि की राह पर प्रशस्त करेगा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सकारात्मक संबंध बनाएगा। अब आगे क्या करना है इसका निर्णय ईरान को करना है। ओबामा ने कहा कि फैसला ईरान सरकार को करना है कि वह अतीत के मुद्दे से ही जूझना चाहती है या अपने देश के लिए अवसर, समृद्धि तथा न्याय का एक व्यापक द्वार खोलना चाहती है।
अमेरिका के इस कदम पर तेहरान में व्यापक तौर पर प्रतिक्रिया हुई है। प्रमुख धार्मिक नेता आयतुल्लाह अहमद जन्नती ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के हालिया ईरान संबंधी बयान को उद्धरित करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के मतभेद आधारभूत प्रकार के हैं और दोनों देशों के बीच एक बड़ा मुद्दा इजराईल और अमेरिका का रवैया है, जो क्षेत्र में तनाव, जनसंहार और अत्याचार जारी रखे हुए हैं। यदि अमेरिका इसी प्रकार इजराईल का समर्थन करता रहा तो तेहरान और वाशिंगटन के संबंध वर्तमान रूप में ही जारी रहेंगे। लेबनान, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान और इराक के मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप बंद किए जाने पर बल दिया और कहा कि जनमत की द्घृणा नारों से समाप्त नहीं हो सकती। अमेरिका से विश्व जनमत की द्घृणा का कारण वाशिंगटन के हाथों विश्ववासियों पर अत्याचार और उनके अधिकारों का हनन है।
साथ ही देश के राष्ट्रपति चुनावों को अस्वस्थ दर्शाने के लिए पश्चिमी संचार माध्यमों के जारी दुष्प्रचारों की ओर संकेत करते हुए कहा कि केवल ईरान का चुनाव ही शत्रुओं के निशाने पर नहीं बल्कि उनका उद्देश्य मतभेदों और तनाव को हवा देकर इस्लामी गणतंत्र की व्यवस्था और इस्लामी क्रान्ति का अंत करना था। किंतु जनता की चेतना, एकता, नैतिकता और सच्चाई तथा इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के मार्गदर्शनों से शत्रुओं के सारे षड्यंत्र निष्फल हो गये। अमेरिका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा का व्यवहार कूटनीतिक नाटक और शब्द-जाल के अतिरिक्त कुछ नहीं है और वे केवल शांतिप्रेम का दिखावा कर रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के परिवर्तन के नारे तथा ईरानी नव वर्ष पर उनके बधाई संदेश की ओर संकेत करते हुए कहा कि इससे न केवल यह कि किसी प्रकार का कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ा है, बल्कि ईरानी जनता के नाम उनके इस बधाई संदेश में भी उन्होंने ईरानी राष्ट्र पर आतंकवाद के समथ्र्ान और परमाणु बम रखने का आरोप लगाया है।धार्मिक नेता खातेमी ने इस बात पर बल दिया कि अमेरिका ने पिछले ५० वषोर्ं से अब तक एक क्षण भी ईरान के विरुद्ध षड्यत्र करना नहीं छोड़ा है। यदि हमने वास्तविक परिवर्तन को देखा तो हमारी धार्मिक शिक्षाएं हमसे कहती हैं कि यदि दूसरा पक्ष वास्तव में संधि करना चाहता है तो तुम भी उसमें रुचि दिखाओ। किंतु यदि हमने यह देखा कि वे केवल मधुर संबंधों का दिखावा कर रहे हैं और उनका व्यवहार धूर्ततापूर्ण है तो अमेरिका के साम्राज्यवादी व्यवहार के संबंध में ईरानी जनता का ३० वर्षों से चला आ रहा साम्राज्य विरोधी रवैया जारी रहेगा। व्हाइट हाउस की विदेश नीतियों में परिवर्तन के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के वचन की ओर संकेत करते हुए कहा कि अभी तक अमेरिकी व्यवहार में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि यद्यपि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ वार्ता की इच्छा प्रकट की है किंतु उन्होंने भी ईरान के बारे में पूर्व बुश सरकार के निराधार दावों को दोहराया है। ईरान के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ आयतुल्लाह हाशमी रफसंजानी ने अपनी प्र्रतिक्रिया में कहा अमेरिका ने लगभग पचास वर्षों से ईरान पर अत्याचार किये हैं किंतु यदि अब वह संधि चाहता है तो अपनी सद्भावना का प्रदर्शन करना चाहिए। उन्होंने अमेरिकी जनता से कोई मतभेद होने से इन्कार किया। यदि अमेरिकी सरकार हमारे साथ अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार व्यवहार करे तो उससे भी हमारी कोई शत्रुता नहीं रहेगी। पूर्व राष्ट्रपति हाशमी रफसंजानी ने कहा कि अमेरिका के आतंरिक मामलों से हमारा कोई संबंध नहीं है किंतु यदि अमेरिका ने अन्य राष्ट्रों पर अत्याचार जारी रखा तो हम चुप नहीं रहेंगे।
इस बीच ६ नवंबर को परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आईएईए ने एक बार फिर बल देकर कहा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूर्ण रूप से शांतिपूर्ण है। आईएईए के महानिदेशक मुहम्मद अलबरादेई ने न्यूयॅार्क में अमेरिका की विदेश नीति परिषद की बैठक में कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ईरान परमाणु शस्त्र बनाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने इसी प्रकार आशा जताई कि उनका कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व ईरान को परमाणु ईंधन देने के बारे में समझौता हो जाएगा। ईरान के विरुद्ध कुछ सैनिक धमकियों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि इजराईल ने ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर आक्रमण का प्रयास किया तो मध्य-पूर्व का क्षेत्र आग के गोले में परिवर्तित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि वे बार-बार कह चुके हैं कि ईरान के परमाणु मामले का समाधान कूटनीतिक मागार्ंे से किया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि ईरान के प्रस्तावित पैकेज और जेनेवा वार्ता की ओर संकेत करते हुए तेहरान ने विश्वास दिलाने का प्रयास किया है कि उसने सदैव आईएईए के नियमों और कानूनों के अनुसार परमाणु क्षमता प्राप्त करने का प्रयास किया है। ईरान विश्व को विश्वास दिलाना चाहता है कि वह किसी भी देश पर आक्रमण का इरादा नहीं रखता किंतु इसके साथ ही किसी को भी ईरान के हितों पर आक्रमण करने की अनुमति भी नहीं देगा।
बीसवीं सदी के ईरान की सबसे महत्वपूर्व द्घटना थी ईरान की इस्लामिक क्रांति। शहरों में तेल के पैसों की समृद्धि और गांवों में गरीबी। सत्तर के दशक का सूखा और शाह द्वारा यूरोप के देशों के प्रतिनिधियों को दिए गए भोज जिसमें अकूत पैसा खर्च किया गया था, ने ईरान की गरीब जनता को शाह के खिलाफ भड़काया। इस्लाम में निहित समानता को अपना नारा बनाकर लोगों ने शाह के शासन का विरोध करना आरंभ किया। १९७९ में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए जिनमें हिंसक द्घटनाओं की संख्या बढ़ती गई। शाह के समर्थकों तथा विरोधियों में हिंसक झड़पें हुइर्ं और इसके फलस्वरूप १९७९ में पहलवी वंश का पतन हो गया और आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान एक इस्लामिक गणराज्य बना। इस्लामिक दुनिया में अपनी स्थित मजबूत की। इसके बाद से ईरान में विदेशी प्रभुत्व लगभग समाप्त हो गया।
दरअसल, अमेरिका की सोच के पीछे पश्चिम एशिया की बदलती हुई परिस्थिति मुख्य रूप से उत्तरदायी है। खाड़ी युद्ध के बाद से लगातार ईरान अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा रहा। और वह इसमें कामयाब भी रहा। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए इराक और अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया। लेकिन अमेरिका खुद अपनी ही चाल में फंसता गया। इराक और अफगान युद्ध के बाद अमेरिकियों को जो शमिर्ंदगी उठानी पड़ी वह किसी से छिपी नहीं है। इराक में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद वहां की सत्ता शियाओं के हाथ में आ गयी। ईरान भी एक शिया बहुल देश है।
ऐसे में इराक और ईरान की नजदीकियां बढ़ना स्वाभाविक है। शियाओं के देश इराक का सऊदी तेल भंडार क्षेत्र दमन के करीब आना, सऊदी अरब के लिए चिंता का विषय है। स्थितियां थोड़ी बदलीं तो बहरीन, लेबनान में शियाओं की बहुलता, कुवैत में शिया जनसंख्या आदि कारण भी तेहरान का हौसला बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं। वहीं ईरान के संबंध सीरिया के साथ काफी अच्छे हैं। २००३ में अमेरिका द्वारा सद्दाम हुसैन को बेदखल किए जाने के बाद से अमेरिका खुद अपनी ही चाल में उलझ गया। अब ऐसे में अगर उसे पश्चिम एशिया में बने रहना है तो ईरान से दोस्ती तो करनी ही पड़ेगी।

कैसे बहाल हो लोकतंत्र

नेपाल पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है। पूर्व नरेश के सत्ता से हटने के बाद ऐसा लग रहा था कि वहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी। लेकिन हाल के द्घटनाक्रम से ऐसा महसूस हो रहा है कि वहां की जमीन अभी लोकतंत्र को विकसित करने के लिए तैयार नहीं है। आम जनता की भावनाओं का
प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां बिखराव की शिकार हैं और देश को एक संविआँाान देने में भी असमर्थ नजर आ रही हैं
नेपाल में राजशाही को समाप्त हुए करीब दो साल हो गए। उम्मीद थी लोकतंत्र स्थापित होगा और जनता की सरकार जनता के लिए स्थापित होगी। पर यह हो न सका है। शायद नेपाल दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जहां एक ही समय में दो नेता उप प्रधानमंत्री पद पर हैं। हारे हुए नेताओं से वहां की सरकार चल रही है। दो जगह से चुनाव हारे प्रधानमंत्री माधव नेपाल राज कर रहे हैं। नये संविधान निर्माण के लिए आम चुनाव हुआ था। संविधान निर्माण का काम समय पर पूरा होगा, इस पर शक ही है। शांति प्रक्रिया मजाक बन कर रह गयी है। माओवादी नहीं चाहें तो क्या मजाल कि कोई सड़क पर चले या संसद चला ले। माओवादियों ने सरकार के प्रति विरोध प्रदर्शन के तहत काठमांडू द्घाटी को ठप कर दिया था। सरकार ने माओवादियों से निपटने के लिए सेना और पुलिस बल को हाईअलर्ट कर दिया था।
इन सब के बीच नेपाल में पिछले कई महीनों से जारी गतिरोध के खत्म होने की संभावना बढ़ गयी है। सिंगापुर में पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला और माओवादियों के प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के बीच हुई मुलाकात में इस समस्या को सुलझाने के लिए रोडमैप तैयार कर लिया गया है। एक समझौते के तहत नेपाल के दोनों प्रमुख नेता मौजूदा संकट और गतिरोध खत्म करने के लिए बहुदलीय राजनीति तंत्र बनाने पर एकमत हो गए हैं। इस समझौते के बाद माओवादी नेता प्रचंड ने देश में जल्द ही नई सरकार के अस्तित्व में आ जाने की उम्मीद जाहिर की। उन्होंने बताया कि इसके लिए एक उच्च स्तरीय राजनीतिक तंत्र बनाया जाएगा। इस बात के जरिए उन्होंने राजनीतिक दलों के नए गठजोड़ की संभावना की ओर इशारा किया।सिंगापुर में कोईराला और प्रचंड के बीच करीब ४५ मिनट की बातचीत के दौरान देश के ताजा संकट पर विचार-विमर्श किया गया। कोईराला ने प्रचंड को राष्ट्रपति का अपमान किए बिना संकट का समाधान खोजने के लिए राजी किया। प्रचंड के सहयोगी समीर दहल के मुताबिक कोईराला के प्रस्ताव पर प्रचंड ने स्वीकृति दे दी है।
इसके बाद दोनों नेताओं के बीच सहमति बन गयी है। माओवादी मई में अपनी सरकार गिरने के बाद से नियमित तौर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने २२ पार्टियों वाली गठबंधन सरकार को अपदस्थ करने के लिए आंदोलन शुरू किया था। वे राष्ट्रपति रामबरन यादव से माफी मांगने को कह रहे थे। साथ ही देश में असैनिक शासन स्थापित करने की भी मांग कर रहे थे। माओवादियों ने विगत चार माह से संसद की कार्यवाही को भी बाधित कर रखा था। इसकी वजह से मौजूदा वित्तीय वर्ष का बजट अब तक पारित नहीं हो सका था।
प्रधानमंत्री कुमार माधव की ओर से की गई बातचीत की पेशकश ठुकराने के दो दिन बाद ही माओवादी बीच का रास्ता खोजने में जुटे थे। इसकी तलाश में प्रचंड ने सिंगापुर के अस्पताल में भर्ती पूर्व प्रधानमंत्री कोईराला से मुलाकात करने का फैसला कर सबको भौंचक कर दिया था। माओवादियों ने केंद्रीय सचिवालय और अन्य क्षेत्रीय प्रशासनिक कार्यालयों का भी कई दिनों से द्घेराव कर रखा था। देश में सरकारी कामकाज पूरी तरह ठप था और आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। मांगों के पूरा नहीं होने पर उन्होंने देशव्यापी बंद की धमकी भी दे रखी थी। माओवादी राष्ट्रपति रामबरन यादव से नागरिक सर्वोच्चता बहाल करने और मौजूदा गठबंधन सरकार को बर्खास्त करने की मांग पर अड़े थे। साथ ही प्रचंड द्वारा बर्खास्त किए गए सैन्य प्रमुख से भी माओवादी नाराज थे। सूत्रों के मुताबिक कोईराला ने प्रचंड से कहा कि वह राष्ट्रपति का अपमान किए बिना समाधान का समर्थन करें, जिस पर प्रचंड ने सकारात्मक सहमति दी है।
इस बीच नेपाल के सत्ताधारी गठबंधन का नेतृत्व कर रही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) का कहना है कि नेपाल के प्रगति करने के लिए भारत का साथ जरूरी है। सीपीएन (एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) के चेयरमैन झलनाथ खनाल ने अपनी भारत यात्रा के दौरान बीबीसी हिन्दी के साथ हुई एक विशेष बातचीत में ये विचार व्यक्त किए। झलनाथ खनाल ने इस दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा, विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं एबी बर्धन और प्रकाश करात से मुलाकात की। झलनाथ खनाल का कहना था कि नेपाल में कैसी राजनीतिक व्यवस्था होगी, कैसे नेपाल आगे बढ़ेगा, इसका फैसला नेपाल की जनता करेगी। लेकिन भारत एक मित्र राष्ट्र है और नेपाल को लेकर भारत में एक व्यापक सहमति है। नेपाल को अपने संद्घर्ष, विकास में भारत की मदद की जरूरत होगी। माओवादियों के टकराव के रास्ते पर उनका कहना था कि इस संकट से निपटने के लिए माओवादियों को समझदारी दिखानी पड़ेगी। राष्ट्रीय सहमति के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। नेपाल में माओवादियों के आंदोलन के कारण सरकार वहां कुछ खास नहीं कर पा रही है। नेपाल में राजशाही की समाप्ति के बाद संविधान लिपिबद्ध करने का काम अगले साल यानी २०१० तक पूरा होना है। लेकिन संदेह है कि वर्तमान संकट के कारण यह निर्धारित समय पर पूरा हो सकेगा।

शिकंजे में २६/११ का मास्टर माइंड

अमेरिका की संद्घीय जांच एजेंसी द्वारा शिकागो के इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर पिछले ३ अक्टूबर को डेविड कॉलमैन हेडली की गिरफ्तारी। उसके पश्चात १८ अक्टूबर को उसके साथी तहव्वुर हुसैन राणा को हिरासत में लिया। गिरफ्तारी के बाद जो तथ्यसामने आये उन्होंने अमेरिका सहित पूरे विश्व को आश्चर्य में डाल दिया। स्वयं भारत की सुरक्षा एजेंसियों के हाथों से तोते उड़ गये। हैरान करने वाली बात यह थी कि इन दोनों के तार पिछले वर्ष २६/११ के मुंबई हमले से जुड़े थे और हमारी सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं थी। छानबीन से साफ हुआ कि हेडली और राणा दोनों पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी नागरिक हैं। हेडली ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों में प्रशिक्षण लिया। वह लश्कर-ए-तैयबा से ताल्लुक रखता था और मुंबई हमलों में उसकी सक्रिय भूमिका रही। हेडली असल में पाकिस्तानी मूल का दाऊद गिलानी है, जिसने दो साल पहले ही अपना नाम बदल लिया था।
अमेरिका का मानना है कि आईएसआई में शामिल कुछ तत्वों के तार हेडली से जुड़े हुए हैं। जबकि भारतीय जांच एजेंसियों का शक है कि लश्कर-ए-तैयबा के ये दोनों सदस्य मुंबई हमलों में शरीक होंगे। भारत को उम्मीद है कि उनके मुंबई हमलों में शामिल होने के बारे में जल्द ही पता लगा लिया जाएगा। हेडली के मामले में भारत और अमेरिका लगातार संपर्क में हैं। यह माना जा रहा है कि एक पाकिस्तानी नागरिक का जकी लश्कर के संचालक जकी उर रहमान लखवी और एफबीआई द्वारा हिरासत में लिए गए इन दोनों लोगों से संपर्क था। इस पाकिस्तानी नागरिक की पहचान गुप्त रखी गई है जिसके बारे में माना जा रहा है कि मुंबई हमले के समय वह पाकिस्तान में था। हेडली मामले के मद्देनजर भारत चाहता है कि अमेरिका आतंकवाद खासकर भारत की ओर केंद्रित आतंकवाद के खात्मे के लिए पाकिस्तान पर और अधिक ध्यान दे। इस बीच अलकायदा और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा आतंकी कमांडर बनने वाले पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी इलियास कश्मीरी को पाकिस्तान में गिरफ्तार किया गया है।
एफबीआई ने भारत और डेनमार्क में आतंकी हमलों की कथित योजना बनाने के आरोप में पाकिस्तान में जन्मे अमेरिकी नागरिक हेडली और पाक में जन्मे कनाडाई नागरिक राणा को गिरफ्तार किया। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि दोनों ने भारत की कई बार यात्रा की और प्रतीत होता है कि ये टोह लेने के लिए विभिन्न स्थानों पर कई बार आये। जानकारों के मुताबिक अमेरिका को पाकिस्तान से यह आश्वासन मिला है कि वह आतंकवाद के सभी स्वरूपों को नष्ट करेगा लेकिन यह निश्चित नहीं है कि क्या इसमें भारत के खिलाफ काम करने वाले आतंकवादी भी शामिल हैं। इस बीच भारत ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान की स्थिति तथा इन दोनों देशों के बारे में अमेरिका की नीति पर विचार-विमर्श किया। सूत्रों के मुताबिक भारत के अफगानिस्तान और पाकिस्तान द्घटनाक्रमों से हित जुड़े हुए हैं। क्योंकि आतंकवाद वहीं से पनपता है।
इस बीच अमेरिका में पकड़े गए लश्कर के आतंकी डेविड कोलमैन हेडली से संबंध रखने के आरोप में पाकिस्तानी सेना के पांच अधिकारियों को भी गिरफ्तार किया गया है। इनमें से कुछ वर्तमान और कुछ निवर्तमान अधिकारी हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार पाकिस्तानी एजेंसियों ने हेडली से संबंध रखने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें से सेना से जुड़े अधिकांश अधिकारी हैं। इस बीच कनाडा मीडिया ने राणा के परिवार का पता लगा लिया है। उसका परिवार ओटावा के एक उपनगरीय इलाके में रहता है। शिकागो के अखबार मेल एंड ग्लोब के मुताबिक कनाडा के उसके द्घर में उसके पिता, भाई और भाभी रहते हैं। वह शिकागो में अपनी पत्नी समराज अख्तर राणा और दो बेटियों और एक बेटा के साथ रहता था। कनाडा की सुरक्षा खुफिया सेवा से जुड़े एक अधिकारी डेविड हैरिस के अनुसार इस बात की आशंका है कि राणा ने अपने इमिग्र्रेशन कारोबार का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों और कनाडा में आतंकवादियों को प्रवेश दिलाने के लिए किया। इस बीच, शिकागो की अदालत ने राणा की जमानत याचिका पर सुनवाई २ दिसंबर तक के लिए टाल दी है।
गौरतलब है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए प्रमुख लियोन पनेटा ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन से डेविड हेडली और तहव्वुर राणा की गतिविधियों के बारे में विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने भारत को ऐसे उपकरण मुहैया कराने का वादा किया है जिसके जरिए किसी भी टेलिफोन बातचीत का, चाहे वह कितनी भी पुरानी हो, पता लगाया जा सकता है। वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई शिखर बैठक के दौरान आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई को और पुख्ता बनाने के लिए एक सहमति के ज्ञापन पर हस्ताक्षर भी हुए। इससे दोनों देशों की एजेंसियों के बीच ठोस सहयोग का सिलसिला शुरू हो जाएगा। इस बीच लियोन पनेटा ने वादा किया है कि कुछ दिनों में ही वे हेडली और राणा की गतिविधियों के बारे में सनसनीखेज जानकारी मुहैया कराएंगे।

बनते नए रिश्ते

चीन अमेरिका की मजबूरी है और भारत अमेरिका की पंसद। दरअसल, अमेरिका जानता है कि चीन कारोबारी दृष्टिकोण से काफी फायदेमंद है। इसलिए ओबामा चीन और भारत के साथ संतुलन बनाने में जुटे हैं। ओबामा ने भारत और अमेरिका संबंधों को निरंतर द्घनिष्टतर बनाने की वकालत की है
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा के वक्त ओबामा प्रशासन और भारत के बीच जो गर्मजोशी देखी गयी वह स्वाभाविक है। आर्थिक मंदी के बाद अब दोनों देशों की मुख्य चिंता
आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने की है। चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए भारत के साथ आर्थिक साझेदारी अमेरिका के हित में है। क्योंकि अभी तक अमेरिका ऐतिहासिक महामंदी की गिरफ्त से उबर नहीं पाया है। वहीं भारत के चिंतित होने की वजह ओबामा की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ती सामरिक और कूटनीतिक नजदीकी थी। हाल के वर्षों में कूटनीतिक संबंधों की बुनियाद आर्थिक रिश्ते पर रखी जा रही है। इस बढ़ती नजदीकी से उम्मीद है कि अमेरिका आतंकवाद समेत भारत की राजनीतिक चिंताओं को लेकर सकारात्मक रुख दिखाएगा। उम्मीद है २१ वीं सदी में भारत-अमेरिका संबंध रिश्तों की नई परिभाषा लिखेंगे।
इस मुश्किल भरी २१ वीं सदी में वैश्विक चुनौतियों से निपटने और अपने अवाम की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिहाज से भारत-अमेरिका साझीदारी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा में भारत और अमेरिका के बीच छह समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। जो आतंकवाद को खत्म करने और उससे निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने से संबंधित है। वैश्विक सुरक्षा को बढ़ावा देने और आतंकवाद से निपटने के समझौते के अलावा दोनों देशों के बीच शिक्षा, विकास स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, द्विपक्षीय व्यापार, कूषि और हरित क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौते किये गये। भारतीय प्रधानमंत्री ओबामा प्रशासन में अमेरिका यात्रा पर आने वाले पहले राजकीय अतिथि रहे। दोनों देशों ने परमाणु अप्रसार, मिसाइल नियंत्रण और परमाणु हथियार मुक्त विश्व के निर्माण के लिए साथ मिलकर काम करने के प्रति वचनबद्धता दोहराई। साथ ही जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से जुड़ी वार्ताओं में भी प्रगति की। दोनों देशो में आतंकवाद और अन्य अंतरराष्ट्रीय संकटों से लड़ने के लिए साथ मिलकर काम करने की बात हुई। ओबामा ने भारतको एक उभरती और जिम्मेदार विश्व शक्ति बताते हुए विश्वास जताया कि भारत और अमेरिका के संबंध और मजबूत होंगे।ओबामा ने माना कि अमेरिका के विकास में भारत की भूमिका अहम होगी। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वर्तमान में अमेरिका जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनका समाधान करने में भारत अहम भूमिका निभाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा उनके देश के युवाओं को भारत में रोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे। आर्थिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिए दोनों देशों के कैबिनेट स्तर के प्रतिनिधि सालाना बैठक करेंगे। यह बैठक बारी-बारी से अमेरिका और भारत में होगी। दोनों देश समूह विशेष आर्थिक नीतियों के बारे में लगातार एक दूसरे से संपर्क बनाए रखेंगे। गौरतलब है कि अमेरिका ने एक ऐसा ही समझौता चीन के साथ पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में किया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उम्मीद जताई है कि यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने में मददगार होगा। उन्होंने आशा जताई कि उच्च स्तर की तकनीकी के हस्तांतरण से उद्योगपतियों को भारतीय बाजार में निवेश करने का बेहतर मौका मिलेगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत और अमेरिका को आतंकवाद के मुद्दे पर स्वाभाविक सहयोगी बताते हुए कहा कि दोनों देश आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाते हुए खुफिया जानकारी साझा करेंगे। भारत को पहली बार परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकारते हुए कहा, 'हम जैसा विश्व देखना चाहते हैं, भारत उसका अभिन्न हिस्सा है। दोनों देशों के बीच आर्थिक, तकनीक-विज्ञान, और पर्यावरण के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, परमाणु करार को पूर्ण रूप से लागू करने पर सहमति बनी है। मनमोहन सिंह के आमंत्रण को स्वीकार करते हुए ओबामा ने अगले वर्ष भारत की यात्रा पर आने के लिए अपनी सहमति दे दी है। उन्होंने अफगानिस्तान में भारत के योगदान की सराहना की और कहा समृद्ध और शांत एशिया के निर्माण में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
इससे पहले व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में ओबामा दम्पती ने प्रधानमंत्री मनमोहन का भव्य स्वागत किया। स्वागत समारोह पहले व्हाइट हाउस के दक्षिणी लॉन में आयोजित किया जाना था, लेकिन बारिश के कारण इसे ईस्ट रूम में आयोजित किया गया। समारोह के बाद दोनों नेता ओवल हाउस में बातचीत करने चले गये। प्रधानमंत्री के सम्मान में ओबामा की तरफ से राजकीय भोज आयोजित किया गया। राष्ट्रपति ओबामा के कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने सबसे बड़ी पार्टी की मेजबानी की।
राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान को उसकी सरजमीं से संचालित आतंकी संगठनों से प्रभावी तरीके से निपटने का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अफगानिस्तान सहित पूरे विश्व से आतंकवाद को नेस्तनाबूद किया जाना चाहिए, यहां काफी हिंसा और आतंकवाद देखा गया है। मुंबई जैसे हमलों को रोकने के लिए खुफिया सहयोग बढ़ाने के लिए सक्रियता से सहयोग करना चाहिए। संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रपति ओबामा ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार को लागू करने पर अपनी पूरी प्रतिबद्धता दोहराई। मनमोहन सिंह ने उम्मीद जताई कि मुझे पूरा विश्वास है कि यह प्रक्रिया बिना किसी और देरी के पूरी होगी। हालांकि पाकिस्तान के खिलाफ भारत के दो टूक बयान के बावजूद अमेरिका ने आक्रामक रुख नहीं अपनाया। ओबामा ने इस मसले पर कूटनीति का परिचय दिया।
मनमोहन सिंह का इस बार का दौरा बराबरी का रहा। बराक ओबामा का हिन्दी में स्वागत करना इसका सबूत है। यह दौरा कुछ पाने और कुछ खोने के लिए नहीं था। असैन्य परमाणु करार को लागू करने, पाकिस्तान में आतंकवाद से मुकाबला करने और जलवायु परिवर्तन जैसे मसले पर असहमति के बावजूद बातचीत का रुख सकारात्मक रहा है। करीब चार साल पहले परमाणु ऊर्जा समझौता बुश के कार्यकाल में हुआ था। लेकिन ओबामा के प्रशासन में प्रसंस्कूत परमाणु ईंधन की आपूर्ति में अड़चन के कारण मसला ठंडे बस्ते में था। इस मुलाकात से उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी। इस दौरे की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत और अमेरिका सीईओ फोरम का पुनर्गठन है। नए फोरम से, जिसकी अगुवाई रतन टाटा और डेविड कोटो करेंगे, ज्यादा कारोबारी पहल की उम्मीद की जा सकती है।
ओबामा ने भारत के उन द्घावों पर सिर्फ मरहम लगाने का काम किया, जो अचानक ही पिछले हफ्ते उनकी चीन यात्रा के दौरान उभर आए थे। यदि चीन और भारत के बारे में ओबामा द्वारा कही गई बातों की बारीकी से समीक्षा की जाए तो यह बात साफ हो जाएगी कि चीन अमेरिका की मजबूरी है और भारत अमेरिका की पंसद। दरअसल, अमेरिका जानता है कि चीन कारोबारी दृष्टिकोण से काफी फायदेमंद है। इसलिए ओबामा चीन और भारत के साथ संतुलन बनाने में जुटे हैं। ओबामा ने भारत और अमेरिका संबंधों को निरंतर द्घनिष्टतर बनाने की वकालत की है। दोनों पक्षों ने शिक्षा, कूषि, सुरक्षा, पर्यावरण, व्यापार आदि क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए छोटे-मोटे कई समझौते किए हैं। लेकिन अभी भी कई ऐसी तकनीक हैं, जिन्हें अमेरिका भारत को देने में संकोच करता है। अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्यता दिलाने पर अपनी राय स्पष्ट नहीं की है। भले ही इस यात्रा को कितना ही सफल क्यों न माना जाए पर अभी यह शुरुआत मात्र है। लेकिन इस यात्रा से एक बात स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में मनमोहन सिंह की यह अमेरिका यात्रा मील का पत्थर साबित होगी।

Tuesday, November 10, 2009

मालदीप पर मंडराता खतरा

मालदीव उन देशों में से है जिन पर ग्लोबल वार्मिग का खतरा कुछ अलहदा ढंग से मंडरा रहा है। बढ़ते समुद्री जलस्तर से इस देश के पूरी तरह समुद्र में समाधि ले लेने की संभावना है। सैंकड़ों छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बने इस देश के करीब पचास द्वीप अभी ही समुद्र में समाने की ओर अग्रसर हैं। अपनी इसी समस्या को दुनिया के सामने पेश करने के लिए मालदीव ने अनूठा तरीका अपनाया। ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को रेखांकित करने के लिए १७ अक्टूबर को मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने अपनी कैबिनेट की बैठक पानी के भीतर की। इस समस्या से निपटने के मालदीव सरकार के अनूठे प्रयोग के बाद अब एक और अनूठी योजना भी बनायी है। सरकार कुछ निर्जन द्वीप धनी देशों को बेचने या पट्टे पर देने की योजना पर विचार कर रही है। अगर यह योजना लागू हो जाती है तो इससे सबसे ज्यादा खतरा भारत के लिए पैदा हो जाएगा।
सैकड़ों टापुओं वाले देश मालदीव का ९० फीसदी इलाका समुद्र तल से महज एक मीटर की ऊंचाई पर है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा खतरा इस देश को ही है। इन्हीं अंदेशों को देखते हुए यहां के राष्ट्रपति डॉ ़ मोहम्मद नशीद ने दुनियाभर के लोगों का ध्यान अपने ओर आकृष्ट करने के लिए समुद्र के अंदर बैठक की। यह भी कि दुनिया भर के देश कार्बन उत्सर्जन की मात्रा सीमित करें। इससे पहले मार्च २००९ में मालदीव सरकार ने अपने मुल्क को कार्बन-न्यूट्रल बनाने की द्घोषणा की थी। शायद यह दुनिया भर के इतिहास में अपनी तरह की पहली द्घटना है। इसमें कोई शक नहीं कि मालदीव का यह नायाब कदम दुनिया भर के लिए मिसाल ही नहीं चुनौती भी है। चुनौती इस मायने में कि क्या दुनिया का कोई खेमा, कोई देश, कोई टापू इसदेश की पीड़ा को समझने के लिए तैयार है, क्या कोई इसके साथ खड़ा होना चाहता है। जाहिर है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले सालों में अकेले मालदीव ही नहीं दुनिया भर के कई देशों के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्व लग जाएगा।
कई खूबसूरत शहर जल समाधि ले लेंगे। एक रिपोर्ट के मुताबिक साल २१०० तक समुंद्र तल की ऊंचाई में कम से कम आधा मीटर की वृद्धि होगी। ऐसे में विश्व की ६० करोड़ आबादी जो तटीय इलाकों या निचले जमीनी इलाकों में रहती है, उसका क्या होगा। आज मालदीव खतरे में है तो कल ग्रीनलैण्ड होगा। आने वाले दौर में ऑस्ट्रेलिया पर भी खतरा मंडराएगा। फिर सीमित संसाधनों में संतुलन बिगड़ेगा।दुनिया का तापमान कम करने के लिए कार्बन कटौती की मांग बार-बार उठती रही है। हाल ही में बैंकाक में जलवायु परिवर्तन पर बैठक हुई। इस बैठक में भारत समेत दुनिया के ३६ विकासशील देशों ने औद्योगिक देशों के सामने मांग रखी है कि वे २०२० तक अपने कार्बन उत्सर्जन में १९९० की तुलना में ४० फीसदी की कमी लाएं। लेकिन औद्योगिक विकसित देशों ने इस मांग को सिरे से नकार दिया। क्वोटो प्रोटोकाल को लेकर अमेरिका शुरू से ही अड़ंगा लगाता रहा है।
मालदीव के लगभग १२०० द्वीप समुद्र तल से लगभग सर्वाधिक सात फीट ऊपर हैं। इनमें से दो तिहाई द्वीप समुद्र तल से सिर्फ चार फीट ऊपर हैं। भारत की यात्रा पर आए यहां के राष्ट्रपति डॉ ़मोहम्मद नशीद ने कहा कि मालदीप को बचाने के लिए काफी धन की आवश्यकता है। भारत मदद कर रहा है। लेकिन हमें और धन की आवश्यकता है। कुछ धनी देश हमें धन देने का प्रस्ताव दे भी रहे है। धन के बदले हमें कुछ बेचना होगा। हम पर्यटन के जरिए धन जुटाने के और प्रयास करेंगे। जरूरी हुआ तो अपनी कुछ स्टे्रटेजिक संपदा (द्वीप) भी बेच सकते हैं।
हिन्द महासागर में आबाद मालदीव का रणनीतिक महत्व है। विशेष रूप से भारत के लिए । चीन पहले ही भारत की द्घेराबंदी करने में जुटा है। वह लंबे समय से मालदीव के किसी द्वीप पर अपना सैन्य अड्डा बनाने की जुगत में लगा है। हालांकि राष्ट्रपति नशीद ने इसकी संभावना से इन्कार किया है। सऊदी अरब और इजराइल भी मालदीव के संपर्क में हैं। अगर चीन द्वीप खरीदने में सक्षम हो जाता है और वहां अपना बेस बना लेता है तो भारत की सुरक्षा के लिए खतरा होगा। द्वीपों को अगर इजराइल या अमेरिका खरीदता है तो वह भी भारत के हित में नहीं होगा।

Friday, October 23, 2009

सुर को सम्मान

मन्ना डे ने हिन्दी फिल्म संगीत को अपने वैविध्यपूर्ण सुर से समृद्ध किया है। क्लासिकल, कव्वाली से लेकर कॉमेडी और रोमांटिक गानों में उनका कोई जोड़ नहीं है। इस वर्ष उन्हें फिल्म जगत के सबसे बड़े दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है। मन्ना डे की गायकी दिल और रूह को छूने वाली होती है। वे अपने ढंग के ऐसे गायक हैं जिनकी नकल संभव नहीं
ऐ मेरे प्यारे वतन' 'ए भाई जरा देख के चलो', 'कस्में वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या' 'ऐ मेरी जोहरा जबीं' 'लागा चुनरी में दाग' 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' 'तू प्यार का सागर है' जैसे सदाबहार नगमें गा चुके ९० वर्षीय मशहूर गायक मन्ना डे को भारतीय सिनेमा में जीवन पर्यन्त शानदार योगदान के लिए वर्ष २००७ का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जाएगा। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल उन्हें यह पुरस्कार २१ अक्टूबर को एक समारोह में प्रदान करेंगी।
पांच दशकों से अधिक की लंबी प्रतीक्षा के बाद ही सही उनकी गायकी को भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजने का फैसला लिया गया है। मोहम्मद रफी ने मन्ना डे के लिए कहा था कि लोग मेरे गाने सुनते हैं और मैं सिर्फ मन्ना डे के। ९० बसंत देखने के बाद भी दमखम वैसा ही कायम है। आज भी गाते हैं और रोज रियाज करते हैं। १८ दिसंबर १९५३ में उन्होंने केरल की सुलोचना कुमारसन से शादी की। मन्ना डे आज के हो- हल्ले वाले संगीत से दुखी हैं। आज गाने का स्वर देखकर मन खिन्न हो जाता है। आज के गाने को देखकर लगता है कि कोई भी गा सकता है।
मौत का उन्हें डर नहीं है। कहते हैं मरना तो पड़ेगा ही, किंतु अतृप्त होकर नहीं तृप्त होकर जाना चाहता हूं। इस जीवन से खुश हूं। जितना प्यार, सम्मान और यश मुझे मिला, उसे सपने में भी नहीं सोचा था। मन्ना डे का पूरा नाम प्रबोध चंद्र डे है। उनका जन्म एक मई १९१९ को बंगाल में हुआ। यहीं उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। १९४२ में मुंबई का रुख किया और कृष्णा चंद्र डे और सचिन देव बर्मन के साथ काम करना शुरू किया। यहीं से उनके करियर की शुरुआत मानी जाती है।
मन्ना डे की खासियत यह रही कि उनके गाये गानों में हिन्दुस्तानी क्लासिकल संगीत हमेशा उपस्थित रहा। उन्होंने उस्ताद अमान अली खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से संगीत की दीक्षा भी ली। मन्ना डे ने १९४० में फिल्म 'राम राज्य' में अभिनय भी किया और गाना भी गाया। इसके बाद फिल्म 'तमन्ना' से उन्होंने पार्श्वगायन में पूरी तरह से कदम रख दिया। इस गाने में कृष्ण चंद्र डे का संगीत था और यह गाना उस जमाने के हिट गानों में शुमार किया गया। मन्ना डे ने लगभग ३५०० गानों को अपनी आवाज से सजाया। उन्होंने कई गाने किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और मुकेश कुमार के साथ भी गाए। वे हिन्दी और बंगाली फिल्मों के महान गायकों में से एक हैं। इससे पहले १९७१ में मन्ना डे को पद्म श्री और वर्ष २००५ में पद्म विभूषण से अलंकृत किया जा चुका है।
पचास के दशक तक मन्ना डे एक मंझे हुए पार्श्व गायक के तौर पर स्थापित हो चुके थे। उन्होंने 'आवारा', 'दो बीद्घा जमीन' 'हमदर्द' 'परिणीता' 'चित्रांगदा' 'बूट पालिश' और 'श्री ४२०' जैसी फिल्मों के लिए पार्श्व गायन किया। आमतौर पर राजकपूर की फिल्मों में मुकेश अपनी आवाज देते थे, लेकिन कुछ गीतों के लिए राजकपूर ने मन्ना डे की आवाज पर भरोसा दिखाया। 'श्री ४२०' का मुड़-मुड़ के न देख प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यू डरता है दिल 'मेरा नाम जोकर' का ए भाई जरा देख के चलो और 'बॉबी' फिल्म का 'ना मांगू सोना चांदी' ऐसे ही कुछ गीत रहे। मन्ना डे की आवाज हर दौर में श्रोताओं ने पंसद की। उन्होंने 'शोले' 'लावारिस' 'सत्यम शिवम सुंदरम' 'यादों की बारात' 'क्रांति' 'कर्ज' 'सौदागर' 'हिन्दुस्तान की कसम' 'बुड्ढा मिल गया' जैसी तमाम फिल्मों के गीतों को अपने सुरों से सजाया। उन्होंने देश के महान शास्त्रीय गायकों में शुमार भीमसेन जोशी के साथ गाकर अपनी सुर साधना का परिचय दिया।
गानों में प्रामाणिकता लाने के लिए मन्ना डे ने प्रयोग भी खूब किए। 'नदिया चले चले रे धारा' में अलाप के लिए कल्याणजी भाई ने बंगाल के लोक गायकों को बुलावा दिया। गोवा के मिजाज को समझते हुए मन्ना डे कुछ दिनों तक उस शैली को समझते रहे, जिसमें उन्हें 'ना मांगू सोना चांदी' जैसा गीत गाना था। 'इक चतुर नार' के लिए भी वह पूरे दक्षिण भारतीय मिजाज में थे। बंगाल के लोक संगीत में तो उनकी आवाज में और भी सोना बिखरा पड़ा है। शैलेंद्र ने 'तीसरी कसम' बनाई तो लोक गायकी की छटा बिखेरता 'चलत मुसाफिर मोह लिया रे' गीत मन्ना डे से गवाया और उन्होंने इसे सहजता और खूबसूरती से गाया भी।
फिल्मी कव्वालियों पर कोई भी चर्चा मन्ना डे के बिना अधूरी है। 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी' 'ऐ मेरी जोहरा जबीं' 'ये इश्क इश्क' और बहुत सी कव्वालियां इसके सबूत हैं। एक तरफ शास्त्रीय संगीत में 'सुर ना सजे' जैसा संजीदा गीत, तो दूसरी और 'ए भाई जरा देख के चलो।' यह करिश्मा मन्ना डे ही कर सकते हैं। उनकी गायकी को गंभीर और महज शास्त्रीयता तक देखने वाले अगर उनके रोमांटिक गीतों की बानगी को समझ लें तो फिर उनसे भूल न होगी। लताजी के साथ उनके बेहद खूबसूरत युगल गीत हैं।
अक्सर कहा जाता है कि मन्ना डे की प्रतिभा का फिल्म जगत पूरा उपयोग नहीं कर पाया। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर में मन्ना डे की अपनी खास जगह रही है। वह लीक पर नहीं चले। केसी डे और उस्ताद अब्दुल रहमान खान जैसे संगीत मर्मज्ञों का सान्निध्य जिसे मिला हो, उसे मन्ना डे बनना ही था। बेशक किसी गीत को फिल्म में लाने में कई पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। इसलिए आवाज में तरुणाई पाने की तलाश में शायद रफी और मुकेश को ज्यादा अवसर मिल गए हों, पर इससे फिल्म संगीत में मन्ना डे का महत्व कम नहीं हो जाता है। उनके कुछ अविस्मरणीय गीत ऐसे भी हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि अगर मन्ना दा नहीं होते, तो फिर संगीतकार उन गीतों की धुन शायद बदल देते।
फिल्म संगीत का वह स्वर्णिम दौर श्रोताओं को कई तरानों की याद दिलाता है जिसे हम आज तक नहीं भूल पाये हैं। यह गीत आज भी लोगों को रोमांचित करता है। 'चढ़ गयो पापी बछुआ' 'तुम गगन के चंद्रमा हो' 'नैन मिले चैन कहां' 'ये रात भीगी भीगी' 'प्यार हुआ इकरार हुआ' 'सुर न सजे' 'पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई' ऐसे ही कई तराने हैं। यह उनकी गायकी का विशाल गगन है कि उन्होंने शास्त्रीयता, कव्वाली, भजन या फिर बंगाल की सुंदर लोकधुनों पर तैयार गीतों को इस कदर गाया कि लोग झूमते रह गए।
मन्ना डे ने संभवतः सबसे ज्यादा थीम सांग गाए हैं। मसलन ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'सफर' में अत्यधिक करूणा है। यही उसका केन्द्रीय भाव भी है। कैंसर के मरीज राजेश खन्ना से शर्मिला टैगोर प्यार करती है। रोना-गाना चलता रहता है। अंत में नायक मर जाता है। इस फिल्म में कई मधुर गीत हैं जो काफी लोकप्रिय भी हुए। मगर इस फिल्म के थीम सांग के लिए ऋषिकेश ने 'मन्ना डे' की मदद ली। इस फिल्म का थीम सांग-'नदिया चले, चले रे धारा, चंदा चले, चले रे तारा ़ ़ ़तुझको चलना होगा' मन्ना डे ने ही गाया। इसी विषय पर एक और फिल्म थी 'आनंद'। उसमें भी नायक राजेश खन्ना थे और कैंसरग्रस्त भी। वह फिल्म भी ऋषिकेश दा की है। उसमें कई कर्णप्रिय गीत मुकेश के स्वर में हैं। लेकिन थीम सांग उन्होंने ही गया है। गीत है 'जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी तो हंसाए, कभी ये रूलाए।
मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' का गीत 'कस्मे वादे प्यार वफा सब बाते हैं, बातों का क्या।' को सूफियाना अंदाज में मन्ना डे ही दे सकते थे। इसी तरह महबूब खान की क्लासिक फिल्म 'मदर इंडिया' का गीत- 'चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया द्घटती जाए रे' को उन्होंने अपनी विशिष्ट आवाज से दार्शनिक टच दिया है। आत्मा को मथती मन्ना डे की आवाज ने निराशा को वह सूफियाना अंदाज दिया है कि वह गीत सुनकर आज भी लोगों के बढ़ते कदम ठिठक जाते हैं। ग्रेट शो मैन राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के गीत 'ए भाई जरा देख के चलो' को कौन भूल सकता है। इस गीत में जीवन-दर्शन है। संवाद शैली में यह गीत है। मन्ना डे की विलक्षण गायन-क्षमता बेमिसाल नमूना है। अरसा हुआ मन्ना डे ने मुंबई को हमेशा के लिए छोड़ दिया। अपने पुराने शहर कोलकाता में रहते हैं। शायद हमें या हिन्दी फिल्मों को मन्ना डे जैसे गायक की जरूरत नहीं रही, क्योंकि हम चलताऊ गाने सुनने के आदी हो गए हैं।

ओबामा को नोबेल

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के नाम नोबेल शांति पुरस्कार का एलान वाकई चौंकाने वाला है। न सिर्फ इसलिए कि पिछले एक दशक में वह तीसरे अमेरिकी राजनेता हैं, जिन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है, इसलिए भी कि सम्मान के लिए
नामांकन की तारीख खत्म होने के ग्यारह दिन पहले ही वे राष्ट्रपति बने थे। नोबेल पुरस्कार समिति ने ओबामा के पक्ष में चाहे जितने भी कसीदें गढ़े हों, लेकिन एक बार फिर यह सर्वोच्च सम्मान विवादों के द्घेरे में आ गया है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि पुरस्कार समिति ने भविष्य में निवेश किया है। इसे एक संयोग कहें या फिर विडंबना कि ओबामा को ऐसे समय नोबेल पुरस्कार मिला जब उन्होंने शांति के दूत कहे जाने वाले प्रसिद्ध धर्मगुरु दलाई लामा से मिलने से इन्कार कर दिया।
ओबामा को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और लोगों के बीच सहयोग को मजबूती देने के उनके असाधारण प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं। दुनिया भर में शांति कायम करने के प्रयास, मुस्लिम देशों के बीच अमेरिका की छवि अच्छी बनाने और परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर वे हमेशा सुर्खियों में रहे। राष्ट्रपति ओबामा ने इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार जीतने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा 'मैं नहीं समझता कि मैं दुनिया की काया पलटने वाले उन अनेक व्यक्तियों के साथ शामिल होने के काबिल हूं।' ओबामा तीसरे ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जिनको उनके कार्यकाल के दौरान इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इससे पहले १९०६ में थियोडोर रोजवेल्ट को, १९१९ में वुडरो विल्सन को यह सम्मान प्रदान किया गया था।
ओबामा की वैश्विक कूटनीति का मुख्य केंद्र मुस्लिम जगत की ओर हाथ बढ़ाना रहा, जो अफगानिस्तान और इराक में युद्ध के चलते लंबे समय से अमेरिका को अपना दुश्मन मानता है। ओबामा ने अमेरिकी युद्धनीति की आलोचना की। पश्चिम एशिया के लिए विशेष दूत की नियुक्ति के बाद इजराइल और फिलीस्तीनी नेताओं को एक मंच पर लेकर आए। उन्होंने जून में काहिरा में मुस्लिम जगत के साथ संबंधों पर प्रमुख भाषण दिया। चौवालीस वर्षीय ओबामा ने ईरान और म्यांमार जैसे देशों के साथ भी बातचीत के दरवाजे खोले जिन पर बीते कई वषोर्ं से आर्थिक प्रतिबंध लागू हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के माध्यम से ओबामा ने विश्व से परमाणु शस्त्रों की कटौती के लिए भी अपील की। यूरोप के लिए रक्षा नीति पर उन्हें रूस से भी समर्थन मिला।
राष्ट्रपति ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की द्घोषणा पर अमेरिकी बेशक गर्व व्यक्त कर रहे हैं लेकिन अगर देश में हुई प्रतिक्रिया को किसी एक शब्द में समेटा जा सकता है तो वह है 'आश्चर्य'। स्वयं अमेरिका में इस फैसले पर आश्चर्य है। मीडिया में वह राष्ट्रीय उत्साह नहीं देखा जा रहा है जो अमेरिकी दिखाने में मशहूर हैं। आश्चर्य में अविश्वास और संशय ही देखने को मिल रहा है। सीएनएन के मॉडरेटर जॉन मान ने पुरस्कार की द्घोषणा पर कहा कि एक व्यक्ति जो सिर्फ नौ महीने से इस उच्च पद पर है, दो देशों में युद्ध लड़ रहा है उसे शांति के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार मिल रहा है।
पुरस्कार मिलने पर आम लोगों को भी हैरानी हुई है। लेकिन इससे भी हैरत में डालने वाली बात यह है कि उनके गृहनगर में ही लोगों को इस पर विश्वास नहीं हो रहा। अखबारों द्वारा कराये गये जनमत सर्वेक्षण से यह बात सामने आयी है कि ७० प्रतिशत लोगों का यह मानना है कि बराक इसके हकदार नहीं हैं। राष्ट्रपति ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार मिलने पर रिपब्लिकनों ने संशय, संदेह और गुस्से के साथ प्रतिक्रिया दी हैं। रिपब्लिकन नेशनल कमेटी के चेयरमैन माइकल स्टीले ने इसे 'दुर्भाग्यपूर्ण' करार दिया और आरोप लगाया कि ओबामा का दर्जा सेलिब्रिटी का है। उन्होंने किसी वास्तविक उपलब्धि के चलते यह सम्मान हासिल नहीं किया है। स्टीले ने अपने बयान में कहा अमेरिकी के साथ-साथ पूरी दुनिया के लोग यह वास्तविक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ओबामा ने किया क्या है?
विश्व शांति के लिए १९९४ में जब प्रमुख फिलिस्तीनी नेता यासिर आराफात को नोबेल पुरस्कार मिला था तो उसका मखौल स्वयं अमेरिकी मीडिया ने उड़ाया था। लिखा जा रहा था, क्या इस बार पुरस्कार के लिए 'हत्यारा' होना शर्त थी। अब जबकि बराक ओबामा को यह सम्मान दिया गया है तो क्या पूछा जा सकता है कि क्या इस बार सिर्फ 'बातें' काफी थीं। गौरतलब है कि ओबामा ने २० जनवरी २००९ को अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ली। नोबेल शांति पुरस्कार के नामांकन की अंतिम तिथि एक फरवरी २००९ थी। यानी ग्यारह दिन के उनके कार्यकाल पर उन्हें विश्व में अमन स्थापित करने का सम्मान दे दिया गया। ओबामा के वे प्रयास जो किसी को दिखे तक नहीं नोबेल कमेटी को 'असाधारण' और 'अद्वितीय' लगे। सम्मान की द्घोषणा वाले दिन तक ही वे नौ माह की किस शांति के अग्रदूत थे?
ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलने पर विश्वभर में मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आयी।
ईरान के राष्ट्रपति के सलाहकार अली अकबर ने उम्मीद जताई कि इस पुरस्कार से बराक ओबामा को पूरी दुनिया में न्याय स्थापित करने के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। हम इससे कतई खिन्न नहीं हैं। हम समझते हैं यह पुरस्कार लेने के बाद ओबामा दुनिया से अन्याय हटाने की दिशा में कुछ व्यावहारिक प्रयास शुरू करेंगे। वहीं अफगानिस्तान में तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह ने कहा है कि ओबामा ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया है। हम ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की भर्त्सना करते हैं। हम उस संगठन की भी भर्त्सना करते हैं, जो ओबामा को शांति पुरस्कार दे रहा है।
बहरहाल, महानता कभी निर्दोष नहीं होती, और शायद नोबेल पुरस्कार भी इससे अछूते नहीं रह सकता। लेकिन जिस सम्मान को पाने की हसरत अनेक लोग पालते हों, उसे इतना पारदर्शी और विवादरहित तो होना ही चाहिए कि उसकी खुद की साख दांव पर न लगे। ऐसा नहीं है कि इस पुरस्कार पर पहली बार कोई प्रश्नचिह्न लगा है। इससे पहले कई बार इस पर उंगली उठी है लेकिन इस वर्ष शांति के नोबेल को लेकर अशांति फैल गयी है। बेशक, ओबामा के इरादे नेक हों, वह दुनिया को परमाणु शस्त्र विहीन बनाने का दम भरते हों, लेकिन उन्हें अपने आचरण से इसे साबित करना चाहिए। ओबामा यथास्थिति को तोड़कर समस्याओं का समाधान चाहते हैं।
परमाणु निरस्त्रीकरण पर उनकी नीयत ज्यादा सुरक्षित विश्व बनाने की है इसमें कोई शक नहीं। ओबामा सच्चे अर्थों में मार्टिन लूथर किंग के अनुयायी हैं जो सौहार्द और संवाद के सहारे समस्याएं सुलझाना चाहते हैं। कुटिलता और स्वार्थ से भरे अंतरराष्ट्रीय राजनय में उनका यह रवैया खुली हवा के झौके की तरह है। यकीनन वे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति को बहुत हद तक बदलने का जोखिम उठाया है।