Wednesday, April 21, 2010

ब्रिटेन में चुनावी बिगुल

ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स की सभी ६५० सीटों के लिए ६ मई को आम चुनाव होगा। हाल में हुए एक सर्वेक्षण से उत्साहित सत्तारूढ़ लेबर पार्टी जहां अपनी लगातार चौथी जीत के लिए बेकरार हैं, वहीं कंजरवेटिव पार्टी १३ साल बाद अपनी खोयी राजनैतिक जमीन फिर से वापस पाने की कोशिश करेगी। इन दो पार्टियों के अलावा मैदान में तीसरी पार्टी है लिबरल डेमोक्रेट, यह पार्टी दोनों प्रमुख दलों से फायदा उठाने की कोशिश करेगी। त्रिशंकु संसद की स्थिति में सौदेबाजी करने के लिए लिबरल डेमोक्रेट ज्यादा राजनीतिक वजन बढ़ाने की कोशिश करेगी। हाल ही में हुए जनमत सर्वेक्षण में ब्रिटेन में होने वाले चुनावों में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने और संसद में त्रिशंकु स्थिति बनने की संभावना व्यक्त की गई है। अगर ऐसा हुआ तो यह वर्ष १९७० के मध्य के बाद से ब्रिटेन में पहली बार होगा। ब्रिटेन के समाचार पत्रों मेल टुडे और पीपुल्स में प्रकाशित जनमत सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार मुख्य विपक्षी दल कंजरवेटिव पार्टी प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन की लेबर पार्टी के मुकाबले नौ प्रतिशत अंक लेकर आगे है। एक अन्य सर्वेक्षण में भी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में त्रिशंकु स्थिति के संकेत मिले हैं। समीक्षकों का मानना है कि कंजरवेटिव पार्टी को नौ अंकों की बढ़त मिलना यह दर्शाता है कि उसे बहुमत मिल सकता है। बीपीआई एक्स पोल में डेविड केमरुन की कंजरवेटिव पार्टी को ३९ प्रतिशत, लेबर पार्टी को ३० प्रतिशत और लिबरल डेमोक्रेट्स को १८ प्रतिशत अंक मिले हैं।
इराक युद्ध और आतंक विरोधी कानून के बावजूद ब्रिटिश मुसलमानों का झुकाव लेबर पार्टी की ओर बना हुआ है। सर्वे के मुताबिक लगभग ५७ प्रतिशत मुस्लिम सत्तारूढ़ लेबर पार्टी के पक्ष में हैं। हालाकि ५३ प्रतिशत मुसलमानों का मानना है कि पिछले दशक में धार्मिक आजादी पर कई तरह की रोक लगी हैं। वहीं ४० प्रतिशत ईसाई प्रमुख विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी का समर्थन कर रहे हैं। इस बीच प्रमुख पार्टियां एशियाई लोगों के मत को अपने पक्ष में करने के लिए योजना बनाने में जुट गयी हैं। आगामी संसदीय चुनाव को देखते हुए कई सांसद संसद में अश्वेत और एशियाई मूल के सदस्यों की संख्या को बढ़ाने के लिए अभियान चला रहे हैं। ब्रिटेन की संसद के कुल सदस्यों में से केवल १५ अश्वेत हैं, जबकि देश की सामान्य आबादी के अनुपात के अनुसार अल्पसंख्यकों की जनसंख्या के हिसाब से ५८ सदस्य अश्वेत या एशियाई मूल के होने चाहिएं। लेबर पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन ने न सिर्फ आर्थिक मंदी से ब्रिटेन को निकाला है, बल्कि विश्व का भी प्रतिनिधित्व किया। लेकिन इस सब के बावजूद ब्राउन को अपनी ही पार्टी में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ब्रिटेन की गार्डन ब्राउन सरकार के दो पूर्व मंत्रियों ने मांग की है कि चुनावों में ब्राउन लेबर पार्टी का नेतृत्व करें या नहीं इस बारे में गुप्त मतदान होना चाहिए। उधर प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है कि पूरा मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन के साथ है। ज्याफ हून और पैट्रिशिया हेविट ने संसद को लिखे पत्र में कहा है कि नेतृत्व के मुद्दे पर जारी अनिश्चितता पार्टी को चुनाव में अपना पक्ष मजबूती से रखने से रोक रही है और इसका फैसला सिर्फ गुप्त मतदान से हो सकता है। लेबर पार्टी के चेयरमैन टोनी लायड ने कहा है कि नेतृत्व को चुनौती कोई संकट नहीं है और यह चुनौती जल्द दम तोड़ देगी। ब्राउन के आलोचकों का कहना है कि उनकी छवि को आर्थिक संकट और अफगानिस्तान में ब्रिटिश सैनिकों की मौतों के चलते काफी नुकसान पहुंचा है। ब्रिटेन चुनाव में इन सब से अलग जो नया देखने को मिलेगा, वह रहेगा अमेरिका के चुनाव प्रचार का सफल तरीका। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव का असर साफ देखा जा सकता है। प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की पत्नियां भी चुनावी मैदान में हैं। प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन के सामने हैं प्रमुख विपक्षी पार्टी कंजरवेटिव के डेविड कैमरन। लेकिन इनकी चुनावी कमान सारा ब्राउन और सामंथा कैमरन के हाथों में होगी। सारा ब्राउन अपने पति की टीम में पब्लिक रिलेशन संभालने में अहम भूमिका निभा रही हैं। दूसरी तरफ डेविड कैमरन ने भी चुनावी अभियान में अपनी स्टाइलिश पत्नी सैम को शामिल कर लिया। वैसे सारा और सैम में समानताएं भी हैं और अंतर भी। सैम बहुत ही उच्च, संभ्रांत द्घराने से हैं, जबकि सारा मिडिल क्लास फैमिली से हैं। बहरहाल इन दोनों की बदौलत चुनावी दंगल काफी दिलचस्प होने वाला है।

महाशक्तियों की संधि

चेकेस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बीच परमाणु हथियारों में कटौती के समझौते में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसे हम ऐतिहासिक कह सकें। बस कहने भर को अमेरिका और रूस अपने परमाणु जखीरों में तीस फीसदी कटौती करेंगे। लेकिन दोनों देशों के पास दुनिया का ९५ प्रतिशत परमाणु भंडार हैं। अगले सात सालों में उनके पास २२०० के बजाय १५५० परमाणु हथियार होंगे, लेकिन इससे दुनिया को क्या फर्क पड़ेगा? दुनिया को खत्म करने के लिए महज चंद परमाणु बम ही काफी हैं। भविष्य में यह संधि निस्त्रीकरण में क्या महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगे? दरअसल ओबामा एक ऐसे विश्व की परिकल्पना करने की कोशिश कर रहे हैं जो परमाणु हथियार मुक्त हो। वाकई उनकी यह सोच अच्छी है। लेकिन इसको अमली जामा भी पहनाया जा सकेगा, मुमकिन नहीं लगता।
अमेरिका और रूस अपने पुराने और कम असर रखने वाले परमाणु हथियारों में एक तिहाई कटौती कर दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि वह इस मुद्दे पर कितने गंभीर हैं। मानो वही दुनिया के सच्चे हितैषी हैं। ओबामा उम्मीद कर रहे हैं ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश इससे प्रेरणा लेकर अपना कार्यक्रम समाप्त कर देगे। जो उनकी भूल है। दो सबसे बड़े परमाणु हथियार संपन्न देश परमाणु हथियारों की संख्या में कटौती को ऐतिहासिक बताकर महज दुनिया को गुमराह कर रहे हैं। आज की तारीख में दुनिया भर में २३ हजार से ज्यादा परमाणु बम हैं।शीत युद्ध के बाद से अंतरराष्ट्रीये स्तर पर कई बदलाव आये। आज दुनिया के कई देश परमाणु संपन्न हो चुके हैं। इन सब के अलावा विश्व के सामने आतंकवाद की चुनौती हैं। आतंकवाद के बाद परमाणु प्रसार दूसरी बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में आतंकी संगठनों के बीच भी परमाणु हथियार पाने की लालसा हैं। अगर वो इसमें कामयाब होते हैं तो दुनिया को बचाना मुश्किल होगा। इस दिशा में दोनों देशों की ओर से कोई सार्थक पहल नहीं की गयी। इस सब के बावजूद दोनों देशों के प्रमुखों ने इसे एक परमाणु रहित दुनिया की तरफ नया कदम बताया।दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों की संख्या कम करने के मकसद से हुई इस संधि से दुनिया के उन देशों को एक सबक मिलने की उम्मीद है जो विनाश के इन हथियारों के पीछे दौड़ रहे हैं। परमाणु आधारित विध्वंशक हथियारों में कटौती कर विश्व को सुरक्षित जीवन देने की राह में दो महाशक्तियां आगे बढ़ी है। इन सब के बावजूद दुनिया भर में उपलब्ध परमाणु साम्रगी और काले बाजार में उपलब्ध तकनीकी के चलते यह खतरा कम हो जाएगा ऐसा नहीं लगता।

Tuesday, March 9, 2010

दो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा

पिछले कुछ अरसे से अमेरिका की स्थिति में जहां गिरावट देखने को मिली, चीन उसके मुकाबले में आगे निकलता दिखाई पड़ा। आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्र्तन पर अमेरिका को काफी फजीहत झेलनी पड़ी। ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों को धता बताकर परमाणु संवर्धन करने में सफलता प्राप्त कर ली। अमेरिका इस से काफी द्घबराया हुआ है। ऐसे में ईरान पर और कडे़ प्रतिबंध लगाने के लिए चीन की मंजूरी जरूरी है। यही कारण है कभी दलाई लामा से मिलने से इंकार करने वाला ओबामा प्रशासन उनसे मुलाकात कर चीन पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है
दुनियाभर की दो महाशक्तियों चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखा जा सकता है। अमेरिका चीन पर दबाव बनाना चाहता है, तो चीन भी इस मामले में पीछे नहीं है। राष्ट्रपति ओबामा के कोपनहेगन की जलवायु शिखर बैठक के दौरान हुए अपमान और ईरान के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों के प्रस्ताव पर चीन की उल्टी राय से भी अमेरिका द्घबराया हुआ है। जलवायु परिवर्तन पर अंतिम समय में चीन का कटौती के प्रस्ताव से इंकार कर देना भी अमेरिका को रास नहीं आया। अमेरिका ने चीन पर दबाव बनाने के लिए पिछले दिनों ताईवान को अरबों डॉलर के आधुनिक श्रेणी के हथियार बेचे। गूगल सेंसरशिप मामले में दोनों देशों के मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं। पश्चिमी देश विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, ऐसे में चीन पर दबाव बनाना जरूरी हो गया। समझा जाता है कि इसी रणनीति के तहत अमेरिका ने चीन के लाख विरोधों के बीच तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा से मुलाकात की।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने १८ फरवरी को तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा से मुलाकात की। नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त इन नेताओं की मुलाकात वैसे तो अनौपचारिक थी, लेकिन इसे लेकर चीन ने काफी आपत्ति जताई। इस बैठक में जो हुआ या उससे भी बढ़कर जो नहीं हुआ, उसे आशाजनक तो कतई नहीं कहा जा सकता। दोनों नेताओं की मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस के मैप रूप में हुई। मैप ऑफिस में दलाई लामा से मुलाकात को ओबामा प्रशासन ने निजी करार दिया। मीडिया को यहां आने से रोक दिया गया। मुलाकात कक्ष में कैमरे के इस्तेमाल की इजाजत नहीं थी। दोनों नेताओं की मुलाकात भले ही मैप रूम में हुई पर इसकी गरज चीन में सुनाई पड़ी। चीन सरकार ने चीन में अमेरिकी राजदूत को तलब किया और ओबामा-दलाई लामा मुलाकात को सरासर 'हस्तक्षेप' की संज्ञा दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा चीन की जनता की राष्ट्रीय भावनाओं को इस मुलाकात से आद्घात पहुंचा इस बीच व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव रॉबर्ट गिब्स ने दोनों नेताओं के बीच हुई इस वार्ता के बाद कहा कि राष्ट्रपति ओबामा ने तिब्बत की अनूठी धार्मिक, सांस्कूतिक और भाषायी पहचान को बचाए रखने तथा चीन में तिब्बतियों के मानवाधिकार की रक्षा के प्रति पूर्र्ण सर्मथन व्यक्त किया। गौरतलब है १९९१ से अमेरिका का प्रत्येक राष्ट्रपति चीन के विरोधों के बावजूद दलाई लामा से बातचीत करता आया है और इस मुलाकात को उसी परंपरा की एक कड़ी माना जा रहा है।
राष्ट्रपति ओबामा बैठक के बाद दलाई लामा के साथ मीडिया के सामने आने का न तो साहस जुटा सके और न ही तिब्बत की स्वायत्तता का कोई जिक्र किया।
इस मुलाकात की एक और वजह हैं। राष्ट्रपति ओबामा को अपनी सत्ता के दूसरे साल में कैनेडी परिवार और डेमोक्रेटिक पार्टी के गढ़ समझे जाने वाले मैसाच्यूसेट्स की सीट पर करारी हार के बाद से अपनी भूलों का अहसास होने लगा और उसे चीन को सीना दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी सिलसिले में चीन के टायरों और इस्पात की ट्यूबों पर शुल्क जड़ना, चीन के गूगल इमेल खातों में सेंध लगाए जाने की शिकायतों की मांग करना, ताईवान को रक्षात्मक हथियार बेचने का फैसला करना और आखिरी चाल के तौर पर दलाई लामा से मिलना शामिल है। दरअसल, सांकेतिक कदमों का यह दौर अमेरिका और चीन के आपसी संबंधों में आ रही खनक से ज्यादा कुछ नहीं। आर्थिक मंदी की विभीषिका झेल चुका अमेरिका दोनों देशों के बीच टकराव का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। मुश्किल यह है कि तिब्बत जैसी समस्याओं का समाधान केवल रचनात्मक आलोचनाओं से नहीं निकल सकता।

भुला दिया 'आम आदमी' को

आम आदमी के नाम पर सत्ता में दूसरी बार वापसी करने वाली यूपीए सरकार ने आम बजट में 'आम आदमी' को ही भुला दिया। वित्त मंत्री ने किसानों और वेतनभोगियों को राहत देने के साथ ही साथ ढांचागत एवं सामाजिक क्षेत्रों के लिए आवंटन में वृद्धि की। लेकिन पेट्रोल, डीजल तथा अन्य
वस्तुओं के उत्पाद शुल्क में वृद्धि से महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ा दीं। महंगाई के मुद्दे पर बजट का बहिष्कार कर मुद्दाविहीन विपक्ष ने भी अपना फर्ज पूरा कर लिया
आध्र प्रदेश में विपक्षी दलों के विधायकों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफे का विरोध का अनूठा तरीका निकाला। टीडीपी नेता पहले तो बैलगाड़ी में फिर साइकिल पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे। उधर केरल की सड़कों पर लाल झंडे लेकर वामपंथी विरोध प्रदर्शन करते दिखाई पड़े तो दिल्ली में प्रतिरोध करने वालों को पानी की बौछारों का सामना करना पड़ा। सरकार के खिलाफ मुद्दों का सूनापन झेल रही विपक्षी पार्टियों के लिए मानो बहार आ गयी। भारत के करीब साठ साल के संसदीय इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ जब पूरे विपक्ष ने एकजुट होकर आम बजट का न सिर्फ बहिष्कार किया, बल्कि संसद से वाक आउट भी किया। विपक्ष के इस व्यवहार को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता। विपक्ष की मानें तो यह देश का 'आम बजट' नहीं, बल्कि 'खास बजट' है।हाल ही हुए आम चुनाव के बाद लोगों को ऐसा महसूस होने लगा था कि अब यूपीए की स्थिर सरकार आम जनता के हित को ध्यान में रखते हुए बजट पेश करेगी। लेकिन पिछले दिनों जिस महंगाई की मार से जनता त्रस्त थी उस पर इस आम बजट ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया है। बीते वर्ष दुनिया को मंदी की मार झेलनी पड़ी, लेकिन इस मंदी के दौरान भी भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई नहीं। लगता है हमारे राजनीतिक दलों खासकर कांग्रेस ने इससे कोई सबक हासिल नहीं किया। यही वजह है कि अपनी अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का जज्बा बजट के दौरान नहीं दिखा। आम आदमी के नाम पर सत्ता में वापसी करने वाली केंद्र सरकार खाद्य वस्तुओं के मूल्य नियंत्रित कर पाने में लाचार दिखी। ऐसी आशा की जा रही थी कि वित्त मंत्री आम बजट में ऐसी कई द्घोषणाएं करेंगे जिससे बेलगाम हो चुके खाद्य पदार्थों के मूल्यों पर गिरावट न सही, स्थिरता देखी जाएगी। लेकिन आम बजट में आम आदमी के लिए ऐसा कुछ नहीं हुआ।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मध्यम वर्ग को आयकर में छूट देकर उसे महंगाई से बचाने का दिखावा करने का प्रयास तो किया, लेकिन उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के साथ पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्धि से स्पष्ट हो गया कि कोई राहत मिलने वाली नहीं। वित्त मंत्री ने माना कि मंदी से हम उबर चुके हैं। मंदी ने हमारे विकास को प्रभावित किया है। मौजूदा महंगाई के लिए उन्होंने मानसून की बेवफाई को दोषी बताया पर मनमोहन सरकार को बरी कर दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि देश की विकास दर ८ .५ फीसदी तक पहुंच जाएगी, लेकिन फिलहाल उनका लक्ष्य नौ फीसदी तक विकास दर हासिल करना है। वित्त मंत्री ने जहां करदाताओं को टैक्स सीमा बढ़ाकर खुश किया वहीं पेट्रोलियम पदार्थों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने के प्रस्ताव ने संसद से सड़क तक लोगों को नाराज कर दिया है। विपक्ष ने इस बजट को जन विरोधी, किसान विरोधी और गरीब विरोधी बताया।दरअसल पिछले वर्ष मंदी के दौर में सरकार ने चुनाव के मद्देनजर रियायतों का पिटारा खोल दिया। करीब साठ हजार करोड़ रुपये के कृषि राहत पैकेज की द्घोषणा की गयी। यही वजह रही कि सरकारी खजाने की स्थिति चिंताजनक हुई और राजकोषीय द्घाटा निराशाजनक होने लगा। राजकोषीय द्घाटे को नियंत्रित करने के लिए हालांकि कुछ नए कर लगाए गए हैं लेकिन अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति से साढ़े पांच प्रतिशत तक इसे ला पाना एक चुनौती है। जानकारों के मुताबिक बजट का कोई दूरगामी परिणाम नजर नहीं आता। आधारभूत ढांचे में बजट आवंटन बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में जान फूंकी जा सकती थी, पर ऐसा हुआ नहीं।एक तरफ जहां अन्य देश लगातार अपने रक्षा बजट में इजाफा कर रहे हैं, वहीं वित्त मंत्री का रक्षा बजट में कंजूसी करना समझ से परे है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों का मनोबल बढ़ाने का कोई उपाय इस बजट में नहीं किया गया है। प्रशासनिक सुधार की बात तो कही गई है पर सरकारी मशीनरी के खर्चे कम करने की कोई चर्चा नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य सामाजिक क्षेत्र के बजट में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई है। खतरा यह है कि थोड़ा-थोड़ा धन सबको देने से सभी दूरगामी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिसका सीधा असर सकल द्घरेलू उत्पाद पर पड़ेगा और जिस राजकोषीय द्घाटे को कम करने की कोशिश की जा रही है वह और बढ़ सकता है। डीजल और पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में एक-एक रुपये प्रति लीटर की वृद्धि करने की द्घोषणा से इनके मूल्यों में ढाई रुपये प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि हो गई। इन प्रस्तावों का विपक्ष ही नहीं, बल्कि सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दलों ने भी भारी विरोध किया। डीजल के दाम बढ़ने से आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरत की चीजें तो महंगी होगी ही बजट प्रस्तावों से बुनियादी क्षेत्र में काम आने वाले सीमेंट, लोहा, कोयला वाहन आदि कई उद्योगों पर सीधा असर पड़ेगा। महंगाई पर बिना मतदान वाली चर्चा से सत्ता पक्ष को राहत मिली, लेकिन यदि समूचा विपक्ष एकजुट बना रहा तो सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि चौथी बार आम बजट पेश कर रहे प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी की तरह शेरो-शायरी का सहारा नहीं लिया और शुरू से अंत तक गंभीर बने रहे।

बातें हैं बातों का क्या?

करीब चौदह महीने के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच सचिव स्तर की बातचीत हुई। नतीजा वही ढाक के तीन पात, जिसकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। पाकिस्तान ने भारत की सभी मांगों को सिरे से नकारते हुए भारत को सलाह न देने की सलाह दी। कुल मिलाकर महज बातचीत के लिए बातें हुईं जिसने अपनी विश्वसनीयता खो दी। कुछ इस अंदाज में कि बातें हैं बातों का क्या? भारत-पाकिस्तान के बीच २५ फरवरी को संपन्न हुई वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मुंबई धमाकों के बाद जो वार्ता रुक गयी थी उसे एक बार फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की गई। वैसे यह बैठक आशा के अनुरूप बेनतीजा ही रही। कोशिश की जा रही थी कि पिछले चौदह माह से जो बर्फ दोनों देशों के बीच जम गयी थी उसे थोड़ा पिद्घलाया जाए। वार्ता के दौरान एक बात तो साफ तौर पर स्पष्ट हो गयी कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हुई है। भारत की ओर से जहां इस वार्ता में मुख्य रूप से पाकिस्तानी जमीन से भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवाद पर जोर दिया गया, वहीं पाकिस्तान ने बलूचिस्तान, कश्मीर और सिंधु नदी के पानी का मुद्दा उठाया। भारत सरकार ने अपने द्घरेलू दबाव को दरकिनार करके दोनों देशों के विदेश सचिव स्तर की बातचीत की पहल की थी। हालांकि आतंकवाद के दंश से पाकिस्तान भी दो चार है, मगर वह भारत के खिलाफ चरमपंथी गतिविधियां चला रहे संगठनों के प्रति इसलिए नरम रवैया अपनाए हुए है कि वह उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है।
चौदह महीने के अंतराल के बाद द्विपक्षीय वार्ता बहाल करते हुए भारत ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर तीन दस्तावेज सौंपे। इन तीनों दस्तावजों में ३४ आतंकवादियों के नाम हैं। जिनमें पाकिस्तान से सेना के रिटायर्ड मेजर इकबाल के अलावा वांछित लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद, मुजम्मिल, अबू हम्जा जैसे आतंकियों को सौंपने की मांग की। एक डोजियर में प्रमुख आतंकी इलियास कश्मीरी की गतिविधियों की जानकारी है। इसमें यह मांग की गई कि इन आतंकवादियों को सौंपा जाए और अन्य प्रभावी कदम उठाये जायें। इस बैठक में भारत ने हाल ही में हुई पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिखों की हत्या पर भी चिंता जताई। निरूपमा राव ने कहा कि हमलों से विश्वास खत्म हुआ है। उन्होंने पाकिस्तानी समकक्ष से कहा कि उनकी सरजमीं से गतिविधियां संचालित कर रहे सभी आतंकवादी समूहों को नेस्तनाबूद करना पाकिस्तान की महती जिम्मेवारी है। भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ढांचे के लगातार बने रहने और पाकिस्तानी क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से भारत के खिलाफ आतंकी हिंसा भड़काने के लिहाज से लश्कर-ए-तैएबा, जमात-उद-दावा, हिज्ब उल मुजाहिदीन आदि जैसे संगठनों की निर्बाध गतिविधियों पर अपनी चिंता जताई।
लेकिन शाम होते ही सलमान बशीर ने जिस लहजे में बात की उस तल्ख अंदाज ने गुड केमिस्ट्री की हवा निकाल दी। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने सारे एजेंडे को ही पलट कर रख दिया। उन्होंने मुंबई हमलों पर कहा कि पाकिस्तान में तो ऐसे कई सौ हमले हो चुके हैं। फिर पिछले तीन साल के दौरान पाकिस्तान में हुए आतंकी हमलों के आंकड़े भी गिना डाले। बशीर ने कश्मीर का राग तो हमेशा की तरफ अलापा ही साथ ही गैर कूटनीतिक अंदाज में भारत को नीचा दिखाने का प्रयास भी किया। साथ ही उन्होंने भारत की आतंकवाद पर चिंता को कोई तरजीह नहीं दी। आतंकी सरगना हाफिज सईद पर दिए दास्तावेज को साहित्य करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान को लेक्चर देने की जरूरत नहीं है।
महज दुनिया को दिखाने की गरज से साथ बैठ कर बात कर लेने से किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती, जब तक कि एक दूसरे की चिंताओं को समझने और सुलझाने की मंशा न हो। इसलिए जब तक पाकिस्तान अपने रुख में नरमी नहीं लाता, भारत के प्रति भरोसा पैदा नहीं करता, ऐसी वार्ताएं महज औपचारिक साबित होती रहेंगी।

Friday, February 12, 2010

करीब आते भारत बांग्लादेश

खालिदा जिया के समय भारत-बांग्लादेश रिश्ते में जो ठंड आ चुकी थी वो शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद पिद्घलने लगी। दरअसल, खालिदा जिया की सरकार पर कट्टरपंथी गुटों का वर्चस्व था जो कभी नहीं चाहते थे कि भारत से संबंध सुधरें। लेकिन अवामी लीग
के आते ही रिश्तों की खटास मिठास में बदलने लगी। गतिरोध और विरोध का सिलसिला टूटा। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की तीन दिवसीय यात्रा से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में एक नये अध्याय की शुरुआत दिखाई पड़ी। भारत ने भी रेड कारपेट से जिस तरह शेख हसीना का स्वागत किया है उससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत का भरोसा बांग्लादेश पर बढ़ा है। बांग्लादेश में हुई सेना बगावत के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अगर ऐसे हालात भविष्य में बने रहे तो बांग्लादेश पर राजनीतिक संकट गहरा सकता है। इसको अवामी लीग ने अच्छी तरह महसूस किया। यही वजह रही कि शेख हसीना ने पदभार संभालते ही भारत को यह भरोसा दिलाया कि बांग्लादेश को आतंकवादियों की पनाहगाह नहीं बनने दिया जाएगा। भारत आगमन पर उन्होंने भारत को यह यकीन दिलाया कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में वह अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। पिछले साल कई उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर उन्होंने यह साबित भी किया।
भारत यात्रा पर आयी शेख हसीना ने जिन महत्वपूर्ण करारों पर समझौते किए। उनमे आपराधिक मामलों में कानूनी सहायता, अंतरराष्ट्रीय और आतंकवाद संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने को लेकर हुआ। तीसरा करार कैदियों की अदला बदली के बारे में हुआ। इस करार ने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि की भूमिका तैयार कर दी है। दूसरी तरफ भारत ने बांग्लादेश को एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने की द्घोषणा की है जो किसी भी देश को एक बार में दी जाने वाली सबसे बड़ी कर्ज-राशि है। भारत ने बांग्लादेश को अपने यहां से नेपाल और भूटान तक रेल और सड़क संपर्क की सुविधा दी है। इन उपायों से दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही के नए रास्ते खुलेंगे। भारत ने बांग्लादेश से अनेक नई वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि भविष्य में इस नकारात्मक सूची को छोटा किया जा सकता है। व्यापारिक मोर्चे पर यह भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। भारत आने वाले समय में चटगांव के बंदरगाह का उपयोग कर सकेगा, जिससे समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी। लेकिन नदियों के पानी के बंटवारे और तीन बीद्घा गलियारे के सीमांकन जैसे कुछ पुराने मुद्दों पर मतभेद जस के तस बना रहा।
बेगम शेख हसीना को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर शेख हसीना भावुक दिखाई पड़ीं। उन्होंने इंदिरा गांधी को याद करते हुए उन्हें अपनी मां जैसा कहा। इंदिरा गांधी से अपनी मुलाकातों को याद कर वह भावुक हो उठीं। उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा उस कठिन समय में श्रीमती गांधी ने उन्हें पनाह दी। वह १९७६ से १९८१ तक दिल्ली में रहीं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति जैसी कृतज्ञता दिखाई, वो दोतरफा रिश्तों के बीच बेहतर संभावना का परिचायक है। यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच हुए इन समझौतों को जानकार रूटीन कूटनीति से आगे आपसी सद्भाव और शांति के क्षेत्र में एक बड़ी पहल मान रहे हैं। भारत दौरे पर आयी शेख हसीना ने कहा कि वो भारत के साथ बेहतर रिश्ते चाहती हैं। ताकि दक्षिण एशिया में स्थायी रूप से शांति हो सके। उन्होंने कहा भारत से हमारा रिश्ता पुराना है। मुक्ति आंदोलन में भारत ने हमारे लोगों की न केवल मदद की बल्कि हमारे संद्घर्ष में भी साथ दिया। उन्होंने कहा कि हम दोस्ती और सहयोग चाहते हैं ताकि अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी का सामना कर सकें। हम गरीबी मुक्त, शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की चाहत रखते हैं। मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की भलाई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश के निर्माण के मात्र चार वर्ष बाद ही १९७५ में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गयी थी। तत्कालीन सैन्य विद्रोह के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। निर्वासित जीवन उन्होंने भारत में ही बिताया। अवामी लीग दुबारा १९९६ में सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार अल्प मत की थी। इस बार जब बांग्लादेश की अवाम ने अवामी लीग को पूर्ण बहुमत दिया तो शेख हसीना भ्ाी भारत के साथ अपने पुराने संबंधों को सुधारने के प्रयास में लग गयीं। भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश नए संकेत पहले ही दे चुका है। जानकारों की मानें तो दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते बड़ा रोल निभा सकते हैं।

राज को राज

श्रीलंका में संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम
चौंकाने वाला नहीं रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे जीतेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। राष्ट्रपति पद के लिए करीब २२ उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और जनरल फोनसेका के बीच ही था। वैसे चुनाव का मुख्य मुद्दा लिट्टे के साथ चल रहे २६ साल पुराने गृहयुद्ध को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाने का ही रहा। ऐसे में आम लोगों की अपेक्षाएं राजपक्षे से ज्यादा थीं। यही कारण उनकी जीत का भी बना। गृहयुद्ध की विभीषिका झेल चुके श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए लोगों ने राजपक्षे के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इन सब के बीच नई सरकार के सामने अभी कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। मसलन सैन्यवाद, मानवाधिकारों का उल्लंद्घन, प्रेस की आजादी, अंधराष्ट्रवाद तथा तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकार।जिस पैमाने पर राजपक्षे को जीत हासिल हासिल हुई है उससे एक बात स्पष्ट है कि अब श्रीलंका में लंबे समय तक राजनीतिक स्थायित्व बना रहेगा। चुनावों में मिली जीत से जानकारों का मानना है कि वहां के हालात में और सुधार आयेगा। ऐसे में राजपक्षे को श्रीलंका में व्याप्त भय के माहौल को खत्म करने के लिए एक अवसर प्राप्त हो गया है। लंबे समय तक चली तमिल और सिंहली खूनी जंग ने श्रीलंका की राजनीति और आर्थिक स्थिति की चूलें हिला दी थीं। देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए राजपक्षे को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्रीलंका अपने हिंसात्मक इतिहास से उबरने में सफल रहेगा। साथ ही ढाई लाख तमिलों को पुनर्वास कैंपों से बाहर निकालकर वापस मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगा।
इस बीच श्रीलंका के रक्षा सचिव का कहना है कि सरकार राष्ट्रपति चुनाव में हार चुके जनरल सनथ फोनसेका के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रही है। वैसे श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनाव परिणामों के बाद हत्या का पुराना इतिहास रहा है। इसे देखते हुए सेना कमांडर फोनसेका ने अपनी जान के खतरे की आशंका जताई है। सैनिकों से द्घिरे एक होटल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जनरल फोनसेना ने कहा कि चुनाव में धांधली हुई है और सरकार उन्हें जान से मरवाने की कोशिश कर रही है। इस बीच सरकार का कहना है कि जनरल होटल छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें उन आरोपों के नतीजों का सामना करना होगा जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान लगाए थे। चुनाव में जनरल को पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग समेत कुछ विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था।
दरअसल राष्ट्रपति राजपक्षे को जनरल फोनसेका की तरफ से दी गई चुनौती कोई सामान्य चुनौती नहीं थी। यह सेना के शीर्ष नेतृत्व का नागरिकों के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव था। अगर यह टकराव आगे भी बना रहा तो श्रीलंका की शांति को नया खतरा हो सकता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह स्थिति किसी सैन्य बगावत की तरफ जाएगी ऐसा नहीं लगता है। लेकिन राजपक्षे की छवि को देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि टकराव का खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए सवाल महज चुनाव जीतने का ही नहीं है। सवाल लोकतंत्र का है, श्रीलंका के अस्तित्व और आगे की रणनीति, कूटनीति का है। गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी श्रीलंका सामान्य नहीं हुआ है। असली चुनौतियां अभी बाकी हैं। ऐसे में भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे पर लगी हैं।जहां तक भारत-श्रीलंका के संबंधों का सवाल है तो कुल मिलाकर अभी तक यह संबंध संतोषप्रद ही रहा है। लेकिन लिट्टे के खात्मे के लिए जिस प्रकार श्रीलंका ने चीन और पाकिस्तान की मदद ली वह भारत के हित में नहीं जाता। लिट्टे के खिलाफ अभियान के दौरान चीन और पाकिस्तान की सैन्य भूमिका श्रीलंका में बढ़ी है। जो भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका में होने वाले परिवर्तनों का भारत पर भी असर पड़ता है। गृहयुद्ध के कारण चरमराई श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए व्यापार के मामले में भारत को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने होंगे। श्रीलंका अभी भी भारत पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे में उसे आर्थिक और राजनैतिक पहल के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।