करीब चौदह महीने के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच सचिव स्तर की बातचीत हुई। नतीजा वही ढाक के तीन पात, जिसकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। पाकिस्तान ने भारत की सभी मांगों को सिरे से नकारते हुए भारत को सलाह न देने की सलाह दी। कुल मिलाकर महज बातचीत के लिए बातें हुईं जिसने अपनी विश्वसनीयता खो दी। कुछ इस अंदाज में कि बातें हैं बातों का क्या? भारत-पाकिस्तान के बीच २५ फरवरी को संपन्न हुई वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मुंबई धमाकों के बाद जो वार्ता रुक गयी थी उसे एक बार फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की गई। वैसे यह बैठक आशा के अनुरूप बेनतीजा ही रही। कोशिश की जा रही थी कि पिछले चौदह माह से जो बर्फ दोनों देशों के बीच जम गयी थी उसे थोड़ा पिद्घलाया जाए। वार्ता के दौरान एक बात तो साफ तौर पर स्पष्ट हो गयी कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हुई है। भारत की ओर से जहां इस वार्ता में मुख्य रूप से पाकिस्तानी जमीन से भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवाद पर जोर दिया गया, वहीं पाकिस्तान ने बलूचिस्तान, कश्मीर और सिंधु नदी के पानी का मुद्दा उठाया। भारत सरकार ने अपने द्घरेलू दबाव को दरकिनार करके दोनों देशों के विदेश सचिव स्तर की बातचीत की पहल की थी। हालांकि आतंकवाद के दंश से पाकिस्तान भी दो चार है, मगर वह भारत के खिलाफ चरमपंथी गतिविधियां चला रहे संगठनों के प्रति इसलिए नरम रवैया अपनाए हुए है कि वह उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है।
चौदह महीने के अंतराल के बाद द्विपक्षीय वार्ता बहाल करते हुए भारत ने पाकिस्तान को आतंकवाद पर तीन दस्तावेज सौंपे। इन तीनों दस्तावजों में ३४ आतंकवादियों के नाम हैं। जिनमें पाकिस्तान से सेना के रिटायर्ड मेजर इकबाल के अलावा वांछित लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद, मुजम्मिल, अबू हम्जा जैसे आतंकियों को सौंपने की मांग की। एक डोजियर में प्रमुख आतंकी इलियास कश्मीरी की गतिविधियों की जानकारी है। इसमें यह मांग की गई कि इन आतंकवादियों को सौंपा जाए और अन्य प्रभावी कदम उठाये जायें। इस बैठक में भारत ने हाल ही में हुई पाकिस्तान में तालिबान द्वारा सिखों की हत्या पर भी चिंता जताई। निरूपमा राव ने कहा कि हमलों से विश्वास खत्म हुआ है। उन्होंने पाकिस्तानी समकक्ष से कहा कि उनकी सरजमीं से गतिविधियां संचालित कर रहे सभी आतंकवादी समूहों को नेस्तनाबूद करना पाकिस्तान की महती जिम्मेवारी है। भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ढांचे के लगातार बने रहने और पाकिस्तानी क्षेत्र तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से भारत के खिलाफ आतंकी हिंसा भड़काने के लिहाज से लश्कर-ए-तैएबा, जमात-उद-दावा, हिज्ब उल मुजाहिदीन आदि जैसे संगठनों की निर्बाध गतिविधियों पर अपनी चिंता जताई।
लेकिन शाम होते ही सलमान बशीर ने जिस लहजे में बात की उस तल्ख अंदाज ने गुड केमिस्ट्री की हवा निकाल दी। पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने सारे एजेंडे को ही पलट कर रख दिया। उन्होंने मुंबई हमलों पर कहा कि पाकिस्तान में तो ऐसे कई सौ हमले हो चुके हैं। फिर पिछले तीन साल के दौरान पाकिस्तान में हुए आतंकी हमलों के आंकड़े भी गिना डाले। बशीर ने कश्मीर का राग तो हमेशा की तरफ अलापा ही साथ ही गैर कूटनीतिक अंदाज में भारत को नीचा दिखाने का प्रयास भी किया। साथ ही उन्होंने भारत की आतंकवाद पर चिंता को कोई तरजीह नहीं दी। आतंकी सरगना हाफिज सईद पर दिए दास्तावेज को साहित्य करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान को लेक्चर देने की जरूरत नहीं है।
महज दुनिया को दिखाने की गरज से साथ बैठ कर बात कर लेने से किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती, जब तक कि एक दूसरे की चिंताओं को समझने और सुलझाने की मंशा न हो। इसलिए जब तक पाकिस्तान अपने रुख में नरमी नहीं लाता, भारत के प्रति भरोसा पैदा नहीं करता, ऐसी वार्ताएं महज औपचारिक साबित होती रहेंगी।
Tuesday, March 9, 2010
Friday, February 12, 2010
करीब आते भारत बांग्लादेश
खालिदा जिया के समय भारत-बांग्लादेश रिश्ते में जो ठंड आ चुकी थी वो शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद पिद्घलने लगी। दरअसल, खालिदा जिया की सरकार पर कट्टरपंथी गुटों का वर्चस्व था जो कभी नहीं चाहते थे कि भारत से संबंध सुधरें। लेकिन अवामी लीग
के आते ही रिश्तों की खटास मिठास में बदलने लगी। गतिरोध और विरोध का सिलसिला टूटा। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की तीन दिवसीय यात्रा से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में एक नये अध्याय की शुरुआत दिखाई पड़ी। भारत ने भी रेड कारपेट से जिस तरह शेख हसीना का स्वागत किया है उससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत का भरोसा बांग्लादेश पर बढ़ा है। बांग्लादेश में हुई सेना बगावत के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अगर ऐसे हालात भविष्य में बने रहे तो बांग्लादेश पर राजनीतिक संकट गहरा सकता है। इसको अवामी लीग ने अच्छी तरह महसूस किया। यही वजह रही कि शेख हसीना ने पदभार संभालते ही भारत को यह भरोसा दिलाया कि बांग्लादेश को आतंकवादियों की पनाहगाह नहीं बनने दिया जाएगा। भारत आगमन पर उन्होंने भारत को यह यकीन दिलाया कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में वह अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। पिछले साल कई उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर उन्होंने यह साबित भी किया।
भारत यात्रा पर आयी शेख हसीना ने जिन महत्वपूर्ण करारों पर समझौते किए। उनमे आपराधिक मामलों में कानूनी सहायता, अंतरराष्ट्रीय और आतंकवाद संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने को लेकर हुआ। तीसरा करार कैदियों की अदला बदली के बारे में हुआ। इस करार ने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि की भूमिका तैयार कर दी है। दूसरी तरफ भारत ने बांग्लादेश को एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने की द्घोषणा की है जो किसी भी देश को एक बार में दी जाने वाली सबसे बड़ी कर्ज-राशि है। भारत ने बांग्लादेश को अपने यहां से नेपाल और भूटान तक रेल और सड़क संपर्क की सुविधा दी है। इन उपायों से दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही के नए रास्ते खुलेंगे। भारत ने बांग्लादेश से अनेक नई वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि भविष्य में इस नकारात्मक सूची को छोटा किया जा सकता है। व्यापारिक मोर्चे पर यह भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। भारत आने वाले समय में चटगांव के बंदरगाह का उपयोग कर सकेगा, जिससे समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी। लेकिन नदियों के पानी के बंटवारे और तीन बीद्घा गलियारे के सीमांकन जैसे कुछ पुराने मुद्दों पर मतभेद जस के तस बना रहा।
बेगम शेख हसीना को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर शेख हसीना भावुक दिखाई पड़ीं। उन्होंने इंदिरा गांधी को याद करते हुए उन्हें अपनी मां जैसा कहा। इंदिरा गांधी से अपनी मुलाकातों को याद कर वह भावुक हो उठीं। उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा उस कठिन समय में श्रीमती गांधी ने उन्हें पनाह दी। वह १९७६ से १९८१ तक दिल्ली में रहीं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति जैसी कृतज्ञता दिखाई, वो दोतरफा रिश्तों के बीच बेहतर संभावना का परिचायक है। यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच हुए इन समझौतों को जानकार रूटीन कूटनीति से आगे आपसी सद्भाव और शांति के क्षेत्र में एक बड़ी पहल मान रहे हैं। भारत दौरे पर आयी शेख हसीना ने कहा कि वो भारत के साथ बेहतर रिश्ते चाहती हैं। ताकि दक्षिण एशिया में स्थायी रूप से शांति हो सके। उन्होंने कहा भारत से हमारा रिश्ता पुराना है। मुक्ति आंदोलन में भारत ने हमारे लोगों की न केवल मदद की बल्कि हमारे संद्घर्ष में भी साथ दिया। उन्होंने कहा कि हम दोस्ती और सहयोग चाहते हैं ताकि अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी का सामना कर सकें। हम गरीबी मुक्त, शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की चाहत रखते हैं। मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की भलाई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश के निर्माण के मात्र चार वर्ष बाद ही १९७५ में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गयी थी। तत्कालीन सैन्य विद्रोह के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। निर्वासित जीवन उन्होंने भारत में ही बिताया। अवामी लीग दुबारा १९९६ में सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार अल्प मत की थी। इस बार जब बांग्लादेश की अवाम ने अवामी लीग को पूर्ण बहुमत दिया तो शेख हसीना भ्ाी भारत के साथ अपने पुराने संबंधों को सुधारने के प्रयास में लग गयीं। भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश नए संकेत पहले ही दे चुका है। जानकारों की मानें तो दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते बड़ा रोल निभा सकते हैं।
के आते ही रिश्तों की खटास मिठास में बदलने लगी। गतिरोध और विरोध का सिलसिला टूटा। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद की तीन दिवसीय यात्रा से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में एक नये अध्याय की शुरुआत दिखाई पड़ी। भारत ने भी रेड कारपेट से जिस तरह शेख हसीना का स्वागत किया है उससे यह बात स्पष्ट होती है कि भारत का भरोसा बांग्लादेश पर बढ़ा है। बांग्लादेश में हुई सेना बगावत के बाद यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अगर ऐसे हालात भविष्य में बने रहे तो बांग्लादेश पर राजनीतिक संकट गहरा सकता है। इसको अवामी लीग ने अच्छी तरह महसूस किया। यही वजह रही कि शेख हसीना ने पदभार संभालते ही भारत को यह भरोसा दिलाया कि बांग्लादेश को आतंकवादियों की पनाहगाह नहीं बनने दिया जाएगा। भारत आगमन पर उन्होंने भारत को यह यकीन दिलाया कि भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने में वह अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। पिछले साल कई उल्फा नेताओं को गिरफ्तार कर उन्होंने यह साबित भी किया।
भारत यात्रा पर आयी शेख हसीना ने जिन महत्वपूर्ण करारों पर समझौते किए। उनमे आपराधिक मामलों में कानूनी सहायता, अंतरराष्ट्रीय और आतंकवाद संगठित अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने को लेकर हुआ। तीसरा करार कैदियों की अदला बदली के बारे में हुआ। इस करार ने भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि की भूमिका तैयार कर दी है। दूसरी तरफ भारत ने बांग्लादेश को एक अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देने की द्घोषणा की है जो किसी भी देश को एक बार में दी जाने वाली सबसे बड़ी कर्ज-राशि है। भारत ने बांग्लादेश को अपने यहां से नेपाल और भूटान तक रेल और सड़क संपर्क की सुविधा दी है। इन उपायों से दोनों मुल्कों के बीच आवाजाही के नए रास्ते खुलेंगे। भारत ने बांग्लादेश से अनेक नई वस्तुओं के शुल्क मुक्त आयात के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि भविष्य में इस नकारात्मक सूची को छोटा किया जा सकता है। व्यापारिक मोर्चे पर यह भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। भारत आने वाले समय में चटगांव के बंदरगाह का उपयोग कर सकेगा, जिससे समुद्री रास्तों से व्यापार बढ़ाने में आसानी होगी। लेकिन नदियों के पानी के बंटवारे और तीन बीद्घा गलियारे के सीमांकन जैसे कुछ पुराने मुद्दों पर मतभेद जस के तस बना रहा।
बेगम शेख हसीना को राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर शेख हसीना भावुक दिखाई पड़ीं। उन्होंने इंदिरा गांधी को याद करते हुए उन्हें अपनी मां जैसा कहा। इंदिरा गांधी से अपनी मुलाकातों को याद कर वह भावुक हो उठीं। उन्होंने अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या का जिक्र करते हुए कहा उस कठिन समय में श्रीमती गांधी ने उन्हें पनाह दी। वह १९७६ से १९८१ तक दिल्ली में रहीं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत के प्रति जैसी कृतज्ञता दिखाई, वो दोतरफा रिश्तों के बीच बेहतर संभावना का परिचायक है। यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच हुए इन समझौतों को जानकार रूटीन कूटनीति से आगे आपसी सद्भाव और शांति के क्षेत्र में एक बड़ी पहल मान रहे हैं। भारत दौरे पर आयी शेख हसीना ने कहा कि वो भारत के साथ बेहतर रिश्ते चाहती हैं। ताकि दक्षिण एशिया में स्थायी रूप से शांति हो सके। उन्होंने कहा भारत से हमारा रिश्ता पुराना है। मुक्ति आंदोलन में भारत ने हमारे लोगों की न केवल मदद की बल्कि हमारे संद्घर्ष में भी साथ दिया। उन्होंने कहा कि हम दोस्ती और सहयोग चाहते हैं ताकि अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी का सामना कर सकें। हम गरीबी मुक्त, शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की चाहत रखते हैं। मेरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य लोगों की भलाई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश के निर्माण के मात्र चार वर्ष बाद ही १९७५ में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गयी थी। तत्कालीन सैन्य विद्रोह के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। निर्वासित जीवन उन्होंने भारत में ही बिताया। अवामी लीग दुबारा १९९६ में सत्ता में आयी लेकिन यह सरकार अल्प मत की थी। इस बार जब बांग्लादेश की अवाम ने अवामी लीग को पूर्ण बहुमत दिया तो शेख हसीना भ्ाी भारत के साथ अपने पुराने संबंधों को सुधारने के प्रयास में लग गयीं। भारत के पूर्वोत्तर में चल रहे आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बांग्लादेश नए संकेत पहले ही दे चुका है। जानकारों की मानें तो दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और बांग्लादेश के अच्छे रिश्ते बड़ा रोल निभा सकते हैं।
राज को राज
श्रीलंका में संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम
चौंकाने वाला नहीं रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे जीतेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। राष्ट्रपति पद के लिए करीब २२ उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और जनरल फोनसेका के बीच ही था। वैसे चुनाव का मुख्य मुद्दा लिट्टे के साथ चल रहे २६ साल पुराने गृहयुद्ध को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाने का ही रहा। ऐसे में आम लोगों की अपेक्षाएं राजपक्षे से ज्यादा थीं। यही कारण उनकी जीत का भी बना। गृहयुद्ध की विभीषिका झेल चुके श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए लोगों ने राजपक्षे के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इन सब के बीच नई सरकार के सामने अभी कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। मसलन सैन्यवाद, मानवाधिकारों का उल्लंद्घन, प्रेस की आजादी, अंधराष्ट्रवाद तथा तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकार।जिस पैमाने पर राजपक्षे को जीत हासिल हासिल हुई है उससे एक बात स्पष्ट है कि अब श्रीलंका में लंबे समय तक राजनीतिक स्थायित्व बना रहेगा। चुनावों में मिली जीत से जानकारों का मानना है कि वहां के हालात में और सुधार आयेगा। ऐसे में राजपक्षे को श्रीलंका में व्याप्त भय के माहौल को खत्म करने के लिए एक अवसर प्राप्त हो गया है। लंबे समय तक चली तमिल और सिंहली खूनी जंग ने श्रीलंका की राजनीति और आर्थिक स्थिति की चूलें हिला दी थीं। देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए राजपक्षे को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्रीलंका अपने हिंसात्मक इतिहास से उबरने में सफल रहेगा। साथ ही ढाई लाख तमिलों को पुनर्वास कैंपों से बाहर निकालकर वापस मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगा।
इस बीच श्रीलंका के रक्षा सचिव का कहना है कि सरकार राष्ट्रपति चुनाव में हार चुके जनरल सनथ फोनसेका के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रही है। वैसे श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनाव परिणामों के बाद हत्या का पुराना इतिहास रहा है। इसे देखते हुए सेना कमांडर फोनसेका ने अपनी जान के खतरे की आशंका जताई है। सैनिकों से द्घिरे एक होटल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जनरल फोनसेना ने कहा कि चुनाव में धांधली हुई है और सरकार उन्हें जान से मरवाने की कोशिश कर रही है। इस बीच सरकार का कहना है कि जनरल होटल छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें उन आरोपों के नतीजों का सामना करना होगा जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान लगाए थे। चुनाव में जनरल को पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग समेत कुछ विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था।
दरअसल राष्ट्रपति राजपक्षे को जनरल फोनसेका की तरफ से दी गई चुनौती कोई सामान्य चुनौती नहीं थी। यह सेना के शीर्ष नेतृत्व का नागरिकों के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव था। अगर यह टकराव आगे भी बना रहा तो श्रीलंका की शांति को नया खतरा हो सकता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह स्थिति किसी सैन्य बगावत की तरफ जाएगी ऐसा नहीं लगता है। लेकिन राजपक्षे की छवि को देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि टकराव का खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए सवाल महज चुनाव जीतने का ही नहीं है। सवाल लोकतंत्र का है, श्रीलंका के अस्तित्व और आगे की रणनीति, कूटनीति का है। गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी श्रीलंका सामान्य नहीं हुआ है। असली चुनौतियां अभी बाकी हैं। ऐसे में भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे पर लगी हैं।जहां तक भारत-श्रीलंका के संबंधों का सवाल है तो कुल मिलाकर अभी तक यह संबंध संतोषप्रद ही रहा है। लेकिन लिट्टे के खात्मे के लिए जिस प्रकार श्रीलंका ने चीन और पाकिस्तान की मदद ली वह भारत के हित में नहीं जाता। लिट्टे के खिलाफ अभियान के दौरान चीन और पाकिस्तान की सैन्य भूमिका श्रीलंका में बढ़ी है। जो भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका में होने वाले परिवर्तनों का भारत पर भी असर पड़ता है। गृहयुद्ध के कारण चरमराई श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए व्यापार के मामले में भारत को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने होंगे। श्रीलंका अभी भी भारत पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे में उसे आर्थिक और राजनैतिक पहल के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।
चौंकाने वाला नहीं रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि इस चुनाव में महिंदा राजपक्षे जीतेंगे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। राष्ट्रपति पद के लिए करीब २२ उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे लेकिन मुख्य मुकाबला राजपक्षे और जनरल फोनसेका के बीच ही था। वैसे चुनाव का मुख्य मुद्दा लिट्टे के साथ चल रहे २६ साल पुराने गृहयुद्ध को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाने का ही रहा। ऐसे में आम लोगों की अपेक्षाएं राजपक्षे से ज्यादा थीं। यही कारण उनकी जीत का भी बना। गृहयुद्ध की विभीषिका झेल चुके श्रीलंका में स्थायी शांति के लिए लोगों ने राजपक्षे के पक्ष में मतदान किया। लेकिन इन सब के बीच नई सरकार के सामने अभी कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। मसलन सैन्यवाद, मानवाधिकारों का उल्लंद्घन, प्रेस की आजादी, अंधराष्ट्रवाद तथा तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकार।जिस पैमाने पर राजपक्षे को जीत हासिल हासिल हुई है उससे एक बात स्पष्ट है कि अब श्रीलंका में लंबे समय तक राजनीतिक स्थायित्व बना रहेगा। चुनावों में मिली जीत से जानकारों का मानना है कि वहां के हालात में और सुधार आयेगा। ऐसे में राजपक्षे को श्रीलंका में व्याप्त भय के माहौल को खत्म करने के लिए एक अवसर प्राप्त हो गया है। लंबे समय तक चली तमिल और सिंहली खूनी जंग ने श्रीलंका की राजनीति और आर्थिक स्थिति की चूलें हिला दी थीं। देश की अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए राजपक्षे को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि श्रीलंका अपने हिंसात्मक इतिहास से उबरने में सफल रहेगा। साथ ही ढाई लाख तमिलों को पुनर्वास कैंपों से बाहर निकालकर वापस मुख्यधारा में लाने में सक्षम होगा।
इस बीच श्रीलंका के रक्षा सचिव का कहना है कि सरकार राष्ट्रपति चुनाव में हार चुके जनरल सनथ फोनसेका के खिलाफ कार्रवाई करने पर विचार कर रही है। वैसे श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की चुनाव परिणामों के बाद हत्या का पुराना इतिहास रहा है। इसे देखते हुए सेना कमांडर फोनसेका ने अपनी जान के खतरे की आशंका जताई है। सैनिकों से द्घिरे एक होटल में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए जनरल फोनसेना ने कहा कि चुनाव में धांधली हुई है और सरकार उन्हें जान से मरवाने की कोशिश कर रही है। इस बीच सरकार का कहना है कि जनरल होटल छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन उन्हें उन आरोपों के नतीजों का सामना करना होगा जो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान लगाए थे। चुनाव में जनरल को पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग समेत कुछ विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त था।
दरअसल राष्ट्रपति राजपक्षे को जनरल फोनसेका की तरफ से दी गई चुनौती कोई सामान्य चुनौती नहीं थी। यह सेना के शीर्ष नेतृत्व का नागरिकों के शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव था। अगर यह टकराव आगे भी बना रहा तो श्रीलंका की शांति को नया खतरा हो सकता है। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह स्थिति किसी सैन्य बगावत की तरफ जाएगी ऐसा नहीं लगता है। लेकिन राजपक्षे की छवि को देखकर ऐसा मालूम पड़ता है कि टकराव का खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए सवाल महज चुनाव जीतने का ही नहीं है। सवाल लोकतंत्र का है, श्रीलंका के अस्तित्व और आगे की रणनीति, कूटनीति का है। गृहयुद्ध खत्म होने के बाद भी श्रीलंका सामान्य नहीं हुआ है। असली चुनौतियां अभी बाकी हैं। ऐसे में भारत सहित पूरी दुनिया की निगाहें श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे पर लगी हैं।जहां तक भारत-श्रीलंका के संबंधों का सवाल है तो कुल मिलाकर अभी तक यह संबंध संतोषप्रद ही रहा है। लेकिन लिट्टे के खात्मे के लिए जिस प्रकार श्रीलंका ने चीन और पाकिस्तान की मदद ली वह भारत के हित में नहीं जाता। लिट्टे के खिलाफ अभियान के दौरान चीन और पाकिस्तान की सैन्य भूमिका श्रीलंका में बढ़ी है। जो भारत के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका में होने वाले परिवर्तनों का भारत पर भी असर पड़ता है। गृहयुद्ध के कारण चरमराई श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसलिए व्यापार के मामले में भारत को श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने होंगे। श्रीलंका अभी भी भारत पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे में उसे आर्थिक और राजनैतिक पहल के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।
Thursday, January 7, 2010
क्या तेलंगाना बन सकेगा
चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन से द्घबराकर केन्द्र सरकार ने पृथक तेलंगाना राज्य देने की द्घोषणा तो कर दी, लेकिन सरकार की यह द्घोषणा आग में द्घी डालने जैसी रही। जहां एक ओर बहुत से कांग्रेसी विधायक और सांसद सरकार के इस फैसले से असंतुष्ट दिखे वहीं दूसरी ओर विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, गोरखालैंड, बोडोलैंड, मिथिलांचल सहित अन्य कई छोटे राज्यों के गठन की मांग को बल मिल गया है। वैसे आंध्र प्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना का गठन भी आसान नहीं होगा। सबसे अहम सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। राजधानी के प्रश्न पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। बंटवारे की लहर आंध्र प्रदेश तक ही समिति रह जाएगी ऐसा मुमकिन नहीं है। पूरे भारतवर्ष में दर्जन भर अलग राज्य बनाने के लिए आवाजें उठनी शुरू हो गयी हैं। दरअसल इसमें कोई शक नहीं कि यदि राव को कुछ हो जाता तो इस बार १९५२ के श्रीरामुलु कांड से भी भयंकर चक्रवात आंध्र को द्घेर लेता।
वर्तमान में जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जा रहा है, उसमें आंध्र प्रदेश के २३ जिलों में से १० जिले आते हैं। मूल रूप से यह निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा है। पिछले दिनों जिस तरह आंध्र प्रदेश का राजनीतिक तापमान दिल्ली के गलियारों में महसूस किया गया उसकी पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। दरअसल यह आंदोलन छह दशक पुराना है। चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया की अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरुआत की थी। उस समय इसका उद्देश्य भूमिहीनों को भूपति बनाना था। बाद में इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथों में आ गई। शुरूआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठी चार्ज में साढ़े तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे। एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा दिया था।
दरअसल कांग्रेस ने कभी नहीं सोचा था कि तेलंगाना का मुद्दा कभी इतना गम्भीर हो जाएगा। कांग्रेस अगर अपने २००४ के वादे के मुताबिक अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण करवा देती तो शेष प्रांतों में अलगाव की आग इतनी तेजी से नहीं भड़कती। आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत ने इस मुद्दे की हवा निकाल दी थी। आंध्र में मजबूत रेड्डी की सरकार ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाकर 'तेलंगाना राष्ट्र समिति' को राजनीतिक हाशिए पर सरका दिया। लेकिन चंद्रशेखर राव के अनशन ने उन्हें महानायक बना दिया। आंध्र की वर्तमान स्थिति ने गृहमंत्री चिदंबरम की द्घोषणा को अधर में लटका दिया है। यदि कांग्रेस का नेतृत्व अपने विधायकों और सांसदों के साथ जोर जबर्दस्ती करता है तो कांग्रेस के सामने नयी चुनौतियां आ सकती हैं। हालांकि तेलंगाना को स्वीकार करने में गलत कुछ नहीं है लेकिन जिन परिस्थितियों में इसे स्वीकार किया गया उस पर जरूर जानकारों को आपत्ति है। जानकारों का कहना है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सरकार ने द्घुटने टेक दिये हैं।
अलग तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश में सड़क से लेकर सदन तक द्घमासान मचा है। आंध्र प्रदेश में जहां जनजीवन बेहाल रहा, वहीं विधायकों के इस्तीफों की बाढ़ आ गयी है। १२९ विधायकों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इनमें ७० कांग्रेस, ३८ तदेपा और १५ प्रजा राज्यम पार्टी के विधायक हैं। इस बीच विधानसभा अध्यक्ष एन कुमार रेड्डी ने विधायकों के इस्तीफे से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर सभी पार्टियों से राय मांगी है कि सदन का कामकाज जारी रखा जाए या नहीं। इस बीच रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपने पिता का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं और अपने समर्थकों से कह रहे हैं कि तेलंगाना व्यवहार्य नहीं है। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। यह शहर किसके साथ जाएगा। सबकी आंखें हैदराबाद की समृद्धि पर टिकी हुई हैं। इसकी वजह से भी तेलंगाना के गठन में देरी हो सकती है। अगर यह शहर तेलंगाना को मिलता है, तो आंध्र प्रदेश पहचानने योग्य नहीं रह जाएगा। सवाल उठता है कि अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चन्द्रशेखर राव की मांग के आगे मजबूर क्यों होना पड़ा।
राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में राव को पीछे आंध्र के रेड्डी समुदाय की ताकत थी। वाईएस रेड्डी की मृत्यु के बाद रेड्डी को मुख्यमंत्री न बनाकर कांग्रेस ने रेड्डियों को नाराज कर दिया। इसलिए रेड्डियों ने कांग्रेस को इस तरह सबक सीखाया है।उधर तेलंगाना को पृथक राज्य बनाए जाने की द्घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी छोटे राज्यों के गठन की वकालत की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर बुंदेलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश) को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए कहा है कि बसपा छोटे राज्यों के पक्ष में है। तेलंगाना के बाद पूर्वोत्तर में भी कई राज्यों के गठन की मांग बुलंद हो गई है। केन्द्र में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी 'बोडोलैण्ड पीपुल्स फ्रंट' ने फिर से बोडोलैंड बनाने की मुखर मांग की है। ऑल असम दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमासा पीपुल्स काउंसिल ने दिमासा जनजातियों को लेकर अलग दिमाराजी राज्य के गठन की मांग उठाई है। इस बीच गोरखालैंड के गठन की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है।
वर्ष १९९२ में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद वाकई देश में काफी तेजी से विकास हुआ। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी दिखा। इसे हम विगत दो दशकों में पैदा हुई आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ सब्र के बांध का टूटना मान सकते हैं। हालांकि भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग नेहरू युग में उठी थी। दरअसल छोटे राज्यों का निर्माण क्षेत्रीय दलों के हित ज्यादा साधता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनता को उकसा रहे हैं। इसलिए यह अति आवश्यक है कि छोटे राज्यों की उभरती मांगों पर एक दीर्द्घकालिक योजना के साथ कार्य किया जाए। इस विचार की भी हवा निकल चुकी है कि छोटे राज्य प्रशासन के लिहाज से बेहतर साबित होते हैं। झारखंड उदाहरण के रूप में सामने है।
वर्तमान में जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जा रहा है, उसमें आंध्र प्रदेश के २३ जिलों में से १० जिले आते हैं। मूल रूप से यह निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा है। पिछले दिनों जिस तरह आंध्र प्रदेश का राजनीतिक तापमान दिल्ली के गलियारों में महसूस किया गया उसकी पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। दरअसल यह आंदोलन छह दशक पुराना है। चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया की अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरुआत की थी। उस समय इसका उद्देश्य भूमिहीनों को भूपति बनाना था। बाद में इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथों में आ गई। शुरूआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठी चार्ज में साढ़े तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे। एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा दिया था।
दरअसल कांग्रेस ने कभी नहीं सोचा था कि तेलंगाना का मुद्दा कभी इतना गम्भीर हो जाएगा। कांग्रेस अगर अपने २००४ के वादे के मुताबिक अलग तेलंगाना राज्य का निर्माण करवा देती तो शेष प्रांतों में अलगाव की आग इतनी तेजी से नहीं भड़कती। आंध्र प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली जीत ने इस मुद्दे की हवा निकाल दी थी। आंध्र में मजबूत रेड्डी की सरकार ने अपनी लोकप्रियता का फायदा उठाकर 'तेलंगाना राष्ट्र समिति' को राजनीतिक हाशिए पर सरका दिया। लेकिन चंद्रशेखर राव के अनशन ने उन्हें महानायक बना दिया। आंध्र की वर्तमान स्थिति ने गृहमंत्री चिदंबरम की द्घोषणा को अधर में लटका दिया है। यदि कांग्रेस का नेतृत्व अपने विधायकों और सांसदों के साथ जोर जबर्दस्ती करता है तो कांग्रेस के सामने नयी चुनौतियां आ सकती हैं। हालांकि तेलंगाना को स्वीकार करने में गलत कुछ नहीं है लेकिन जिन परिस्थितियों में इसे स्वीकार किया गया उस पर जरूर जानकारों को आपत्ति है। जानकारों का कहना है कि ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सरकार ने द्घुटने टेक दिये हैं।
अलग तेलंगाना पर आंध्र प्रदेश में सड़क से लेकर सदन तक द्घमासान मचा है। आंध्र प्रदेश में जहां जनजीवन बेहाल रहा, वहीं विधायकों के इस्तीफों की बाढ़ आ गयी है। १२९ विधायकों ने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इनमें ७० कांग्रेस, ३८ तदेपा और १५ प्रजा राज्यम पार्टी के विधायक हैं। इस बीच विधानसभा अध्यक्ष एन कुमार रेड्डी ने विधायकों के इस्तीफे से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर सभी पार्टियों से राय मांगी है कि सदन का कामकाज जारी रखा जाए या नहीं। इस बीच रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपने पिता का अनुकरण करने की कोशिश कर रहे हैं और अपने समर्थकों से कह रहे हैं कि तेलंगाना व्यवहार्य नहीं है। इस सब के बीच सबसे बड़ा सवाल हैदराबाद को लेकर उठ रहा है। यह शहर किसके साथ जाएगा। सबकी आंखें हैदराबाद की समृद्धि पर टिकी हुई हैं। इसकी वजह से भी तेलंगाना के गठन में देरी हो सकती है। अगर यह शहर तेलंगाना को मिलता है, तो आंध्र प्रदेश पहचानने योग्य नहीं रह जाएगा। सवाल उठता है कि अचानक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चन्द्रशेखर राव की मांग के आगे मजबूर क्यों होना पड़ा।
राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में राव को पीछे आंध्र के रेड्डी समुदाय की ताकत थी। वाईएस रेड्डी की मृत्यु के बाद रेड्डी को मुख्यमंत्री न बनाकर कांग्रेस ने रेड्डियों को नाराज कर दिया। इसलिए रेड्डियों ने कांग्रेस को इस तरह सबक सीखाया है।उधर तेलंगाना को पृथक राज्य बनाए जाने की द्घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी छोटे राज्यों के गठन की वकालत की है। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उत्तर प्रदेश को विभाजित कर बुंदेलखंड और पश्चिम उत्तर प्रदेश (हरित प्रदेश) को अलग राज्य बनाने की मांग करते हुए कहा है कि बसपा छोटे राज्यों के पक्ष में है। तेलंगाना के बाद पूर्वोत्तर में भी कई राज्यों के गठन की मांग बुलंद हो गई है। केन्द्र में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी 'बोडोलैण्ड पीपुल्स फ्रंट' ने फिर से बोडोलैंड बनाने की मुखर मांग की है। ऑल असम दिमासा स्टूडेंट्स यूनियन और दिमासा पीपुल्स काउंसिल ने दिमासा जनजातियों को लेकर अलग दिमाराजी राज्य के गठन की मांग उठाई है। इस बीच गोरखालैंड के गठन की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है।
वर्ष १९९२ में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद वाकई देश में काफी तेजी से विकास हुआ। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी दिखा। इसे हम विगत दो दशकों में पैदा हुई आर्थिक विकास की असमानता के खिलाफ सब्र के बांध का टूटना मान सकते हैं। हालांकि भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग नेहरू युग में उठी थी। दरअसल छोटे राज्यों का निर्माण क्षेत्रीय दलों के हित ज्यादा साधता है। यही वजह है कि क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनता को उकसा रहे हैं। इसलिए यह अति आवश्यक है कि छोटे राज्यों की उभरती मांगों पर एक दीर्द्घकालिक योजना के साथ कार्य किया जाए। इस विचार की भी हवा निकल चुकी है कि छोटे राज्य प्रशासन के लिहाज से बेहतर साबित होते हैं। झारखंड उदाहरण के रूप में सामने है।
क्या यही इंसाफ है बस छह माह
आखिरकार १९ सालों के बाद रूचिका को इंसाफ मिला। लेकिन देरी से मिलने वाले इस इंसाफ पर एक लंबी बहस ने जन्म ले लिया है, आखिर एक संवेदनशील मामले में इतनी देर क्यों हुई। ऐसे कई सामाजिक संगठन,बुद्धिजीवी, पत्रकारिता जगत के लोग और अन्य वर्ग मुखर होकर सामने आने लगे हैं। रूचिका एक मात्र ऐसी पीड़िता नहीं हैं देश भर में, न जाने कितनी रूचिकाएं हैं जो किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती हैं। राठौर को हुई छह महीने की सजा काफी है या कम, इस पर भी बहस छिड़ गयी है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। कानून के जानकार कानून का उपयोग अपने हित में करने से कभी नहीं चूकते। राठौर के मामले में राजनीतिक पार्टियां भी अपने को पाक साफ दामन नहीं कह सकतीं। राजनीतिक दल भी उतने ही दोषी हैं जितने कि राठौर।
चंडीगढ़ की सीबीआई की विशेष अदालत ने हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डी जी पी) एसपीएस राठौर को १४ वर्षीय टेनिस खिलाड़ी रूचिका से छेड़छाड़ का दोषी करार देते हुए उन्हें सजा सुनाई। अदालत ने राठौर को छह महीने की कैद और एक हजार रूपये जुर्माना भरने का आदेश दिया। जुर्माना न अदा करने की हालत में राठौर को एक माह की सजा और हो सकती है।१४ वषीय किशोरी रूचिका गिराहोत्रा एक टेनिस खिलाड़ी थी। १२ अगस्त १९९० को वह राठौर के द्वारा छेड़छाड़ का शिकार हुई। राठौर उस समय हरियाणा में आई जी और हरियाणा टेनिस एसोशियेशन के अध्यक्ष थे। छेड़छाड़ के करीब तीन साल बाद रूचिका ने १९९३ में जहर पीकर आत्महत्या कर ली थी। रूचिका ने इस छेड़खानी की बात अपने पिता को नहीं बताई थी। लेकिन उसकी सहेली ने राठौर द्वारा रूचिका के उत्पीड़न को देखा और पूरा मामला अपने परिवार वालों को बताया था। मधुप्रकाश १९९७ में इस मामले को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय में लेकर गई। उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने यह मामला दर्ज किया था। १९९८ में यह पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।मुकदमें के दौरान बार-बार मजिस्ट्रेट बदले गए और गवाहों को प्रभावित करने की लगातार प्रयास भी किये गये। इस बीच राठौर हरियाणा के पुलिस महानिदेशक बन गए । वर्ष २००२ में राठौर डीजीपी के पद से सेवानिवृत हो गए। सितंबर २००२ में रूचिका के भाई ने भी आत्महत्या कर ली थी।
रूचिका की सहेली और इस द्घटना की एकमात्र गवाह अराधना गुप्ता इस मामले का फैसला सुनने के लिए आस्ट्रेलिया से अपने पति के साथ चंडीगढ़ आई थी। आराधना, रूचिका की सहयोगी टेनिस खिलाड़ी और पड़ोसी थी। इस द्घटना के वक्त वह मात्र १३ साल की थी। फैसला सुनाए जाते वक्त अदालत में राठौर और उनकी वकील पत्नी आभा राठौर भी उपस्थित थे। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रथम दृष्टया राठौर के खिलाफ मामला बनता है। मधु ने पत्रकारों से हुई बात चीत में बताया कि वह खुश है कि राठौर को छह महीने के कडे़ कारावास की सजा सुनाई गई है। लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी है कि अदालत को मामले में फैसला सुनाने में इतना अधिक समय लगा।राठौर शायद ऐसे पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं जिन्हें सजा सुनाई गयी है। इससे पूर्व शिवानी भटनागर हत्याकांड में रविकांत शर्मा को अभियुक्त बनाया गया। पूर्व डीजीपी रमेश सहगल को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा गैर कानूनी रूप से हिरासत में रखने के आरोप में आईपीएस अधिकारी अनिल डाबरा को कैद की सजा सुनाई गयी थी। एक नाबालिग को गैरकानूनी हिरासत में रखने के आरोप में एक अन्य आईपीएस अधिकारी एम . एस .अहलावत भी सुप्रीम कोर्ट से दण्डित हो चुके हैं। पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक के पीएस गिल पर भी एक आई ए एस महिला अधिकारी से छेड़छाड़ का आरोप लग चुका है।आनंद प्रकाश और उनके परिवार ने जो भी किया यकीनन वह काबिले तारीफ है। उन्होंने जो हिम्मत दिखाई उससे कई लोगों को हौसला मिलेगा। प्रकाश परिवार ने जो मिसाल कायम की है वह आने वाली नई नस्लों के
चंडीगढ़ की सीबीआई की विशेष अदालत ने हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डी जी पी) एसपीएस राठौर को १४ वर्षीय टेनिस खिलाड़ी रूचिका से छेड़छाड़ का दोषी करार देते हुए उन्हें सजा सुनाई। अदालत ने राठौर को छह महीने की कैद और एक हजार रूपये जुर्माना भरने का आदेश दिया। जुर्माना न अदा करने की हालत में राठौर को एक माह की सजा और हो सकती है।१४ वषीय किशोरी रूचिका गिराहोत्रा एक टेनिस खिलाड़ी थी। १२ अगस्त १९९० को वह राठौर के द्वारा छेड़छाड़ का शिकार हुई। राठौर उस समय हरियाणा में आई जी और हरियाणा टेनिस एसोशियेशन के अध्यक्ष थे। छेड़छाड़ के करीब तीन साल बाद रूचिका ने १९९३ में जहर पीकर आत्महत्या कर ली थी। रूचिका ने इस छेड़खानी की बात अपने पिता को नहीं बताई थी। लेकिन उसकी सहेली ने राठौर द्वारा रूचिका के उत्पीड़न को देखा और पूरा मामला अपने परिवार वालों को बताया था। मधुप्रकाश १९९७ में इस मामले को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय में लेकर गई। उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने यह मामला दर्ज किया था। १९९८ में यह पूरा मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था।मुकदमें के दौरान बार-बार मजिस्ट्रेट बदले गए और गवाहों को प्रभावित करने की लगातार प्रयास भी किये गये। इस बीच राठौर हरियाणा के पुलिस महानिदेशक बन गए । वर्ष २००२ में राठौर डीजीपी के पद से सेवानिवृत हो गए। सितंबर २००२ में रूचिका के भाई ने भी आत्महत्या कर ली थी।
रूचिका की सहेली और इस द्घटना की एकमात्र गवाह अराधना गुप्ता इस मामले का फैसला सुनने के लिए आस्ट्रेलिया से अपने पति के साथ चंडीगढ़ आई थी। आराधना, रूचिका की सहयोगी टेनिस खिलाड़ी और पड़ोसी थी। इस द्घटना के वक्त वह मात्र १३ साल की थी। फैसला सुनाए जाते वक्त अदालत में राठौर और उनकी वकील पत्नी आभा राठौर भी उपस्थित थे। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया था कि प्रथम दृष्टया राठौर के खिलाफ मामला बनता है। मधु ने पत्रकारों से हुई बात चीत में बताया कि वह खुश है कि राठौर को छह महीने के कडे़ कारावास की सजा सुनाई गई है। लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी है कि अदालत को मामले में फैसला सुनाने में इतना अधिक समय लगा।राठौर शायद ऐसे पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं जिन्हें सजा सुनाई गयी है। इससे पूर्व शिवानी भटनागर हत्याकांड में रविकांत शर्मा को अभियुक्त बनाया गया। पूर्व डीजीपी रमेश सहगल को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा गैर कानूनी रूप से हिरासत में रखने के आरोप में आईपीएस अधिकारी अनिल डाबरा को कैद की सजा सुनाई गयी थी। एक नाबालिग को गैरकानूनी हिरासत में रखने के आरोप में एक अन्य आईपीएस अधिकारी एम . एस .अहलावत भी सुप्रीम कोर्ट से दण्डित हो चुके हैं। पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक के पीएस गिल पर भी एक आई ए एस महिला अधिकारी से छेड़छाड़ का आरोप लग चुका है।आनंद प्रकाश और उनके परिवार ने जो भी किया यकीनन वह काबिले तारीफ है। उन्होंने जो हिम्मत दिखाई उससे कई लोगों को हौसला मिलेगा। प्रकाश परिवार ने जो मिसाल कायम की है वह आने वाली नई नस्लों के
सिफर रहा कोपनहागन सम्मलेन
पहली बार ऐसा देखने को मिला जब जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विश्व भर के नेताओं ने बारह दिनों तक माथापच्ची की, एक मंच पर दिखे, रूठने मनाने का सिलसिला चला,आखिरी वक्त तक संस्पेंस बना रहा। दो डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों में कटौती की बात कही गयी पर किसी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस लक्ष्य को हासिल कैसे किया जाएगा?
विकसित देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने से जिस तरह पीछे हटे उससे उनकी नीयत पर शक होना आवश्यक है। किसी सम्मेलन में सहमति पर पहुंचने के लिए इतनी खींचातानी कभी नहीं हुई। अंततः कोपेनहेगन का नतीजा सिफर रहा। इस सम्मेलन की कोई उपलब्धि रही हो या नहीं पर एक बात जरूर सामने आई वह यह कि दुनिया भर के लोग इसे लेकर चिंतित जरूर दिखे। इसने एक अहसास जरूर पैदा किया कि पृथ्वी गंभीर संकट में हैं
बारह दिनों तक चले कोपेनहेगन सम्मेलन के अंतिम दिन तक गतिरोध बना रहा। थक हार कर अंततः वही समझौता पारित कर दिया गया जो अमेरिका ने भारत, चीन, ब्राजील सहित कुछ प्रमुख विकासशील देशों के साथ मिल कर तैयार किया था। २०२० तक ग्लोबल वार्मिंग दो डिग्री सेल्सियस से कम पर सीमित रखने पर सहमति बनी है लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट समय सीमा या कानूनी बंदिश नहीं है। समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने के संबंध में कोई बाध्यकारी लक्ष्य द्घोषित करने का जिक्र नहीं किया गया है। विकसित देश अपने रवैये पर अड़े रहे। कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में हुए शिखर सम्मेलन में कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हो पाने की वजह से २०१० में मेक्सिको में होने वाले शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर लग गयी है। गौरतलब बात यह है कि कोपेनहेगन समझौता में धरती के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी नहीं होने देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है लेकिन यह तय नहीं हो पाया की इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा।
फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह समझौता भविष्य में क्या गुल खिलाएगा। लेकिन इसे एक शुरुआत जरूर कहा जा सकता है। इस समझौते को सम्मेलन में सर्व सहमति से स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन इस पर आगे विचार करने का मार्ग जरूर प्रशस्त हुआ है। एक चीज और उभरकर सामने आयी वह यह कि दुनिया के सभी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश कम से कम एक मंच पर जरूर इकट्ठा हुए। हालांकि अमेरिका और विकासशील देशों के बीच समझौते में किसी तरह का लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है। सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने अमेरिका और कुछ प्रमुख विकासशील देशों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने से साफ मना कर दिया। लेकिन उन्होंने इस पर विचार व्यक्त करने पर सहमति जताई। इन देशों का मानना है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य काफी कम है। पर्यावरण से जुड़े लोग इस समझौते को नाकाफी और दिशा विहिन समझौता मान रहे हैं।
कोपेनहेगन में विकासशील एवं निर्धन देश यह चाह रहे थे कि विकसित देश कम से कम चालीस प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर सहमत हो जाएं, लेकिन अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने खुद कार्बन उत्सर्जन में तीन-चार प्रतिशत कमी लाने की हामी भरी और भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय निगरानी वाले दायरे में लाने की कोशिश की। इस तरह उसने अपनी जिम्मेदारियों से साफ मुंह-मोड़ लिया। भले ही अमेरिका यह कहे कि वह एक संतोषजनक समाधान पर पहुंच चुका है लेकिन जी-७७ विकासशील देशों एवं अन्य निर्धन राष्ट्रों ने जिस तरह इस समझौता को खारिज कर दिया उससे यह समझा जा सकता है कि कोपेनहेगन में कुछ हाथ नहीं लगा। विकसित देश पर्यावरण में आ रहे बदलाव को लेकर चिंता जरूर जता रहे हैं लेकिन बाकी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वे सिर्फ चिंता जता रहे हैं। विकसित देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने से जिस तरह पीछे हटे उससे उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। १९९० से ही अमेरिका पर्यावरण संरक्षण के उपायों से खुद को अलग करता चला आ रहा है। बुश प्रशासन की तरह ओबामा ने भी क्वोटो प्रोटोकॉल से किनारा करने में अपना हित समझा। शायद यही वजह है कि कोपेनहेगन में कोई सर्वमान्य समझौता नहीं हो सका।
पर्यावरण संरक्षण पर गंभीरता दिखाने वाले यूरोपियन देशों ने १९९० के आधार पर २०२० तक ३० प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कटौती की पेशकश की बशर्ते अमेरिका भी उनका साथ दे। विकसित देश यह तो मान रहे हैं कि यदि भारत, चीन, ब्राजील सरीखे देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं की तो २०२० तक पर्यावरण का बेहद बुरा हाल हो सकता है, लेकिन वे इन देशों की चिंताओं के अनुरूप कोई कदम नहीं उठाना चाहते। जहां विकसित देशों ने भारत,चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को अंतरराष्ट्रीय निगरानी वाले समझौते में बांधने की कोशिश की वहीं इन चार देशों ने विकसित देशों पर कार्बन उत्सर्जन में प्रभावी कटौती करने का दबाव बनाया है। दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को साध रहे हैं इसलिए किसी सहमति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यही वजह है कि कोपेनहेगन में आखिरी क्षणों तक गहमागहमी और भ्रम का माहौल बना रहा। शायद यह पहला अवसर है जब किसी सम्मेलन में सहमति पर पहुंचने के लिए इतनी खींचतान हुई और फिर भी नतीजा सिफर रहा! महत्वपूर्ण बात यह है कि जब क्वोटो प्रोटाकॉल की लिखित शर्तों को बड़े देशों ने मानने से इनकार कर दिया, तो कुछ देशों की सहमति पर भला किस तरह अमल होगा। उससे भी बड़ी चिंता यह है कि पृथ्वी के गरमाते चले जाने का कोई समाधान नहीं है। अगर दुनिया को वाकई बचाना है तो ग्रीन हाउस गैसों में २५ से ४० फीसदी तक कटौती करनी पड़ेगी। इस सम्मेलन का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि दुनिया भर के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी। इसी झंझावत के बीच भविष्य में कोई समाधान सामने जरूर आएगा।
विकसित देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने से जिस तरह पीछे हटे उससे उनकी नीयत पर शक होना आवश्यक है। किसी सम्मेलन में सहमति पर पहुंचने के लिए इतनी खींचातानी कभी नहीं हुई। अंततः कोपेनहेगन का नतीजा सिफर रहा। इस सम्मेलन की कोई उपलब्धि रही हो या नहीं पर एक बात जरूर सामने आई वह यह कि दुनिया भर के लोग इसे लेकर चिंतित जरूर दिखे। इसने एक अहसास जरूर पैदा किया कि पृथ्वी गंभीर संकट में हैं
बारह दिनों तक चले कोपेनहेगन सम्मेलन के अंतिम दिन तक गतिरोध बना रहा। थक हार कर अंततः वही समझौता पारित कर दिया गया जो अमेरिका ने भारत, चीन, ब्राजील सहित कुछ प्रमुख विकासशील देशों के साथ मिल कर तैयार किया था। २०२० तक ग्लोबल वार्मिंग दो डिग्री सेल्सियस से कम पर सीमित रखने पर सहमति बनी है लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट समय सीमा या कानूनी बंदिश नहीं है। समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने के संबंध में कोई बाध्यकारी लक्ष्य द्घोषित करने का जिक्र नहीं किया गया है। विकसित देश अपने रवैये पर अड़े रहे। कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में हुए शिखर सम्मेलन में कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हो पाने की वजह से २०१० में मेक्सिको में होने वाले शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर लग गयी है। गौरतलब बात यह है कि कोपेनहेगन समझौता में धरती के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोतरी नहीं होने देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है लेकिन यह तय नहीं हो पाया की इस लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाएगा।
फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह समझौता भविष्य में क्या गुल खिलाएगा। लेकिन इसे एक शुरुआत जरूर कहा जा सकता है। इस समझौते को सम्मेलन में सर्व सहमति से स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन इस पर आगे विचार करने का मार्ग जरूर प्रशस्त हुआ है। एक चीज और उभरकर सामने आयी वह यह कि दुनिया के सभी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश कम से कम एक मंच पर जरूर इकट्ठा हुए। हालांकि अमेरिका और विकासशील देशों के बीच समझौते में किसी तरह का लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है। सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने अमेरिका और कुछ प्रमुख विकासशील देशों के बीच हुए समझौते को स्वीकार करने से साफ मना कर दिया। लेकिन उन्होंने इस पर विचार व्यक्त करने पर सहमति जताई। इन देशों का मानना है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य काफी कम है। पर्यावरण से जुड़े लोग इस समझौते को नाकाफी और दिशा विहिन समझौता मान रहे हैं।
कोपेनहेगन में विकासशील एवं निर्धन देश यह चाह रहे थे कि विकसित देश कम से कम चालीस प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर सहमत हो जाएं, लेकिन अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने खुद कार्बन उत्सर्जन में तीन-चार प्रतिशत कमी लाने की हामी भरी और भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय निगरानी वाले दायरे में लाने की कोशिश की। इस तरह उसने अपनी जिम्मेदारियों से साफ मुंह-मोड़ लिया। भले ही अमेरिका यह कहे कि वह एक संतोषजनक समाधान पर पहुंच चुका है लेकिन जी-७७ विकासशील देशों एवं अन्य निर्धन राष्ट्रों ने जिस तरह इस समझौता को खारिज कर दिया उससे यह समझा जा सकता है कि कोपेनहेगन में कुछ हाथ नहीं लगा। विकसित देश पर्यावरण में आ रहे बदलाव को लेकर चिंता जरूर जता रहे हैं लेकिन बाकी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वे सिर्फ चिंता जता रहे हैं। विकसित देश कार्बन उत्सर्जन को कम करने से जिस तरह पीछे हटे उससे उनकी प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। १९९० से ही अमेरिका पर्यावरण संरक्षण के उपायों से खुद को अलग करता चला आ रहा है। बुश प्रशासन की तरह ओबामा ने भी क्वोटो प्रोटोकॉल से किनारा करने में अपना हित समझा। शायद यही वजह है कि कोपेनहेगन में कोई सर्वमान्य समझौता नहीं हो सका।
पर्यावरण संरक्षण पर गंभीरता दिखाने वाले यूरोपियन देशों ने १९९० के आधार पर २०२० तक ३० प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कटौती की पेशकश की बशर्ते अमेरिका भी उनका साथ दे। विकसित देश यह तो मान रहे हैं कि यदि भारत, चीन, ब्राजील सरीखे देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं की तो २०२० तक पर्यावरण का बेहद बुरा हाल हो सकता है, लेकिन वे इन देशों की चिंताओं के अनुरूप कोई कदम नहीं उठाना चाहते। जहां विकसित देशों ने भारत,चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को अंतरराष्ट्रीय निगरानी वाले समझौते में बांधने की कोशिश की वहीं इन चार देशों ने विकसित देशों पर कार्बन उत्सर्जन में प्रभावी कटौती करने का दबाव बनाया है। दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को साध रहे हैं इसलिए किसी सहमति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यही वजह है कि कोपेनहेगन में आखिरी क्षणों तक गहमागहमी और भ्रम का माहौल बना रहा। शायद यह पहला अवसर है जब किसी सम्मेलन में सहमति पर पहुंचने के लिए इतनी खींचतान हुई और फिर भी नतीजा सिफर रहा! महत्वपूर्ण बात यह है कि जब क्वोटो प्रोटाकॉल की लिखित शर्तों को बड़े देशों ने मानने से इनकार कर दिया, तो कुछ देशों की सहमति पर भला किस तरह अमल होगा। उससे भी बड़ी चिंता यह है कि पृथ्वी के गरमाते चले जाने का कोई समाधान नहीं है। अगर दुनिया को वाकई बचाना है तो ग्रीन हाउस गैसों में २५ से ४० फीसदी तक कटौती करनी पड़ेगी। इस सम्मेलन का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि दुनिया भर के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी। इसी झंझावत के बीच भविष्य में कोई समाधान सामने जरूर आएगा।
इक नज़र में २००९
'विश्व राजनीति साल भर अमेरिका, अफगानिस्तान, ईरान, चीन के ईद-गिर्द द्घूमती रही। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को शांति का नोबल पुरस्कार मिलना शांति के साथ-साथ नोबल के चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर गया। कोपनहेगन समझौता के जिस तरह के नतीजे सामने आए उससे साफ हो गया कि शाक्तिशाली और अमीर देशों की मनमानी कम होने वाली नहीं है
वर्ष २००९ में जिन मुद्दों ने सुर्खियां बटोरीं उनमें ओबामा को नोबेल पुरस्कार का मिलना, भारत-अमेरिका के बीच बढ़ती नजदीकियां, ईरान में अहमदीनेजाद की वापसी, लिट्टे सरगना प्रभाकरण का अंत, म्यांमार का परमाणु कार्यक्रम,
अफगानिस्तान में करजई का दुबारा राष्ट्रपति बनना तथा नेपाल में अस्थिरता शामिल हैं। जर्मनी में मॉकेल एंजेल की वापसी, जापान में पचास वर्षों के बाद सत्ता परिवर्तन, भारत-चीन की बीच बढ़ती कटुता, पाकिस्तान की अस्थिरता, तालिबान नेता बैतुल्लाह मेहसूद का मारा जाना तथा ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी चर्चा में रहा। इटली के प्रधानमंत्री का विवादों में रहना और साल के अंत में उन पर हुए हमले के साथ-साथ टाईगर वुड्स के प्रेम प्रसंगों का चर्चा में आना और पॉप सिंगर माइकल जैक्सन की असमय मृत्यु के साथ ही वर्ष का समापन कोपेनहेगन की असफलता के साथ हुआ।
बीते साल की उपलब्यिों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा को भला कैसे भुला जा सकता है। ओबामा प्रशासन की गर्मजोशी देखने लायक थी। २१वीं सदी में वैश्विक चुनौतियों से निपटने और अपने अवाम की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिहाज से भारत-अमेरिकी साझीदारी महत्वपूर्ण रही। इस यात्रा के दौरान छह समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। र्ष की खास द्घटनाओं में श्रीलंका में लिट्टे और प्रभाकरन का अंत प्रमुख रहा। श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के अंतिम ठिकाने मुल्लईतिब पर कब्जा कर लिया। लिट्टे की युद्ध विराम की द्घोषणा और दुनिया भर से तमाम विरोध के बावजूद श्रीलंका ने लिट्टे को नेस्तनाबूद कर देने का अभियान जारी रहा। श्रीलंका सरकार ने आर- पार की लड़ाई का मन बना लिया। लिट्टे और सेना के बीच निर्णायक कही जाने वाली इस जंग में हजारों निर्दोष तमिल नागरिक मारे गये, लाखों की तादाद में शरणार्थी बने। आखिरकार लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण को श्रीलंकाई सेना ने मार गिराया। पिछले छब्बीस सालों में दक्षिण एशिया की यह सबसे बड़ी कार्रवाई रही। द्घमासान लड़ाई में लिट्टे के कई प्रमुख कमांडरों समेत ढाई सौ लड़ाके मारे गए। मरने वालों में प्रभाकरण, उसका बेटा चार्ल्स एंथनी, प्रभाकरण के शीर्ष सहयोगी खुफिया इकाई के प्रमुख पोट्ट अम्मन और नौ सेना प्रमुख सूसई शामिल रहे।
पिछले साल का सबसे बड़ा आश्चर्य रहा ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलना। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नाम नोबेल पुरस्कार चौकाने वाला रहा। जिसे लेकर इस पुरस्कार पर सवाल भी उठे। स्वयं ओबामा ने अपने को इस पुरस्कार के लायक नहीं माना। लगभग आधी सदी तक चले शीत युद्ध के बाद विद्घटित रूस के साथ अमेरिकी रिश्तों की बर्फ पिद्घलती दिखी। बराक ओबामा रूस से बेहतर संबंध बनाने के इच्छुक दिखे। कई महत्वपूर्ण समझौते के बावजूद ओबामा की रूस में मौजूदगी मौसम के तापमान के साथ ठंडी दिखी। पिछले बीस सालों से रिश्ते पर जमीं बर्फ इतनी सख्त हो चुकी थी जिसे हटाना ओबामा के लिए काफी मुश्किल रहा। वर्ष २००९ की शुरूआत बांग्लादेश के लिए अच्छी रही। सात साल बाद हुए आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली शेख हसीना प्रधानमंत्री बनी। लेकिन साल के दुसरे महीने में २५ फरवरी को बीडीआर जवानों ने विद्रोह कर दिया। लगभग ३३ द्घंटे तक चले इस विद्रोह में सेना के अधिकारियों समेत करीब ७४ लोग मारे गए। इसी साल जून में बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि शेख मुजीबुरेरहमान ने ही बांग्लादेश की आजादी की द्घोषणा की थी इसलिए उन्हें राष्ट्रपिता माना जाना चाहिए। साल के मध्य में समुद्री तूफान 'आइला' ने बांग्लादेश में भयंकर तबाही मचाई।
पड़ोसी देश नेपाल में भी प्याले में तूफान रहा। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के इस्तीफे के बाद नेपाल में तूफान सा आ गया। ढाई सौ वर्षों के बाद नेपाल की राजशाही का अवसान हुआ। देश में लोकतंत्र बहाली की उम्मीदें जगी लेकिन बाद में वह भी धूमिल होने लगीं। सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल को बर्खास्त करने के प्रचंड के फैसले ने तूफान ला दिया। सहयोगी दलों के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गयी। अंततः प्रचंड को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। आतंक का पर्याय बन चुके अफगानिस्तान में २० अगस्त को चुनाव संपन्न हुए। भय, हिंसा और संगीन के साये में लोगों ने मतदान किया। कई देशों के पर्यवेक्षक वहां मौजूद रहे। सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए। लेकिन चुनाव परिणाम किसी के पक्ष में नहीं आया। हमीद करजई के निकटतम प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला-अब्दुल्ला ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। आखिरकार फिर से मतदान हुआ और करजई को दूसरे कार्यकाल के लिए अफगानिस्तान का राष्ट्रपति नियुक्त किया गया।
पड़ोसी देश म्यांमार में लगभग पांच दशकों से लोकतंत्र के आंदोलन को पैरों तले रौंदने वाली सैन्य सरकार की तानाशाही चरम पर रही। पिछले तेरह सालों से अपने ही द्घर में नजरबंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की इस वर्ष भी हिरासत में रहीं। जनाल थानश्वे की अगुवाई में निरंकुश सैन्य सरकार ने सूकी की रिहाई के लिए दुनिया भर से उठी आवाजों को एक बार फिर दरकिनार कर दिया। १९९० में हुए आम चुनाव में सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को मिली भारी सफलता के बाद उन्हें निर्वाचित प्रधानमंत्री द्घोषित किया गया था लेकिन सैनिक तानाशाही ने सू की जीत को मानने से इनकार कर दिया और सत्ता हस्तांतरण से मना कर दिया। म्यांमार की गोपनीय परमाणु गतिविधियों ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। म्यांमार के इस कदम से दक्षिण एशिया की सुरक्षा को गहरा धक्का लगा।
ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद अमेरिकी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहे। अमेरिका अहमदीनेजाद की जीत से बौखला गया। तमाम विरोधों के बावजूद आखिरकार ५ अगस्त को ईरान के राष्ट्रपति पद की दूसरी बार अहमदीनेजाद ने शपथ ली। अहमदीनेजाद की भारी जीत के बाद चुनाव हारे मीर हुसैन मुसवी के समर्थकों ने चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। दुनिया के सामने इसे ईरान पर मंडराता संकट बताया गया। दरअसल यह ईरान का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा दिखाया गया संकट था। अहमदीनेजाद की जीत से अमेरिका के मामले पर पसीना आ गया। वर्ष २००९ में नस्लवाद का मुद्दा छाया रहा। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों और भारतीय मूल के लोगों पर हमले जारी रहे। नस्लवाद के आरोपों को लेकर हो हल्ला मचता रहा। इन द्घटनाओं के बाद ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे भारतीयों छात्रों के बीच दशहत का माहौल रहा। भारतीय अधिकारियों ने ऑस्ट्रेलिया सरकार को अपनी चिंता से अवगत कराया। ऑस्ट्रेलिया में नस्लीय हमलों के विरोध में हजारों की संख्या में भारीतय छात्र सड़कों पर उतरे। लगातार हो रहे हमलों से नेता, अभिनेता दोनों नाराज दिखे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी से मिलने वाली डॉक्टरेट की मानक उपाधि लेने से इंकार कर दिया। ऑस्ट्रेलिया में इस तरह की सैकड़ों द्घटनाएं द्घटीं।
वर्ष २००९ में जापान के चुनाव सम्पन्न हुए। जापान पर लगातार पचपन वर्ष से सत्ता पर काबिज लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को जनता ने नकार दिया। विपक्षी पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान को नयी बागडोर संभालने को मिली। हातोयामा ने इसे सत्ता के लिए मतदान करार दिया। इस चुनाव में सत्तारूढ़ दल के कई बड़े नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा। हातोयामा, अपने दादा इशिरो हातोयान के बाद अपने परिवार के दूसरे सदस्य हैं, जिन्होंने जापान के प्रधानमंत्री का पद संभाला।बीते वर्ष की प्रमुख द्घटनाओं में अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का काहिरा संबोधन लोकप्रिय हुआ। उन्होंने अमेरिका और इस्लाम के बीच मतभेद मिटाने का आह्वान किया। अपने भाषण में ओबामा ने अमेरिका के प्रति मुस्लिम देशों की नाराजगी को दूर करने की हर संभव कोशिश की। उन्होंने मुस्लिम देशों की दुखती रगों को छूने की कोशिश की। अफगानिस्तान और इराक में फैला अमेरिका प्रशासन मुसलमानों के प्रति अपनी सदाशयता का प्रयास करता दिखा। अमेरिका को ऐसा प्रतीत होने लगा कि हर समस्या का समाधान जंग से नहीं हो सकता।
वर्ष २००९ में भारत चीन के रिश्ते में खटास देखने को मिली। चीनी सेना ने भारत के लददख क्षेत्र में द्घुसकर चीनी भाषा में लाल रंग से 'चीन' लिख दिया। चीन ने न सिर्फ भारतीय सीमा में द्घुसपैठ बढ़ाई, बल्कि पड़ोसी देशों में दखल बढ़ाकर भारत को द्घेरने की कोशिश की। उसका यह कदम विस्तारवादी रणनीति का रहा। चीन का सिनजियांग प्रांत अपनी सांप्रदायिक हिंसा के कारण चर्चा में रहा। पांच जुलाई २००९ को भड़के इस दंगे में दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए और आठ सौ से अधिक द्घायल हुए। दुनिया ने सिनजियांग की वीभत्स तस्वीरों को देखा। अपराध जगत की महारानी जई कीपिंग की गिरफ्तारी भी चर्चा में रही। छियालिस वर्षीय यह महिला गैर कानूनी तरीके से जुए के अड्डे चलाने के लिए जानी जाती है। साथ ही लोगों को गैर कानूनी तरीके से बंधक बनाने, समुद्र तटीय नगरों में अवैध तरीकों से नशीले पदार्थ बेचने का आरोप उन पर लगा।
फरवरी २००८ में पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली बेनजीर भुट्टो के कत्ल की इबारत लिखने के बाद शुरू हुई। लेकिन वर्ष २००९ में पाकिस्तान में पूरी तरह अराजकता रही। सुधार की बात तो दूर पाकिस्तान आतंकवाद के दलदल में धंसता चला गया। देश में जातीय हिंसा, आतंकवाद और अर्थिक संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में तालिबान और अलकायदा की चुनौती कमजोर होने की बजाय दिन-ब-दिन बढ़ती ही गयी। अमेरिकी हाथों से संचालित ऑपरेशन में कई मासूमों की जानें गयीं। पाकिस्तान का बलूचिस्तान दूसरा बांग्लादेश बनने की ओर अग्रसर दिखा। पाक सरकार ने अपनी नाकामी का ठीकरा भारत और अफगानिस्तान के सिर फोड़ने का प्रयास किया। ब्लूचिस्तान में पाकिस्तान विरोधी गतिविधियां वर्ष २००४ में और बढ़ी। गत वर्ष पाकिस्तान पर कई आतंकी हमले हुए।
तमाम आरोपों और विरोधों के बीच अफ्रीकी कांग्रेस के शीर्ष और बहुचर्चित नेता जैकब जुमा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने में सफल रहे। जुमा को रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। पूर्व राष्ट्रपति थाबो म्बेकी की सारी चालें धरी की धरी रह गई। अपहरण, भ्रष्टाचार दलाली और बलात्कार जैसे आरोपों को खारिज कर जनता ने उन्हें अपने सर आंखों पर बिठाया। इसमें जैकब की जनता के बीच लोकप्रियता और गरीबों के मसीहा की छवि अहम रही। नौ मई २००९ को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले जैकब जुमा दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यक अश्वेत नागरिाकों के बीच काफी लोकप्रिय रहे। 'गरीबों का मसीहा और आमजन का प्रतिनिधि' का नारा देकर चुनाव जीतने वाले जैबक जुमा दक्षिण अफ्रीका की गरीब अश्वेत की उम्मीदों की किरण बने।वर्ष २००९ में जर्मनी में सम्पन्न हुए चुनाव में जनता ने एक बार फिर मॉकेल पर ही भरोसा किया। पूर्ववर्ती सतारूढ़ गठबंधन में शामिल रहे अपने प्रतिद्वंद्वी दल को धूल चटाते हुए लगातार दूसरी बार न सिर्फ शानदार जीत दर्ज की बल्कि अपने पसंदीदा दल के साथ गठबंधन बनाने में भी सफल रहीं।
विलासिता और भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में रहे इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी साल के आखिर में जनता के कोप का शिकार बने। मिलान शहर में एक व्यक्ति ने उन पर हमला कर उन्हें द्घायल कर दिया। इससे पहले जॉर्ज बुश पर भी जूता फेंका गया था। २००९ में नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में चर्चा में रहा सीटीबीटी एक बार फिर बहस के केन्द्र में रहा। परमाणु बमों का आतंकवादियों के हाथ लगने का भय भी दुनिया को सताता रहा। अमेरिका सरकार में तकरीबन दस वर्षों के बाद 'सीटीबीटी' को वैश्विक बहस के केन्द्र में लाने की कवायद शुरू हुई।वैसे यह साल कुदरती कहर का भी रहा। दुनिया के कई देशों में बीते साल कुदरत ने अपना कहर बरपाया। इंडोनेशिया,वियतनाम फिलीपींस और इटली में भारी तबाही हुई। सैकड़ो लोगों की जानें गयी।
वर्ष २००९ में जिन मुद्दों ने सुर्खियां बटोरीं उनमें ओबामा को नोबेल पुरस्कार का मिलना, भारत-अमेरिका के बीच बढ़ती नजदीकियां, ईरान में अहमदीनेजाद की वापसी, लिट्टे सरगना प्रभाकरण का अंत, म्यांमार का परमाणु कार्यक्रम,
अफगानिस्तान में करजई का दुबारा राष्ट्रपति बनना तथा नेपाल में अस्थिरता शामिल हैं। जर्मनी में मॉकेल एंजेल की वापसी, जापान में पचास वर्षों के बाद सत्ता परिवर्तन, भारत-चीन की बीच बढ़ती कटुता, पाकिस्तान की अस्थिरता, तालिबान नेता बैतुल्लाह मेहसूद का मारा जाना तथा ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी चर्चा में रहा। इटली के प्रधानमंत्री का विवादों में रहना और साल के अंत में उन पर हुए हमले के साथ-साथ टाईगर वुड्स के प्रेम प्रसंगों का चर्चा में आना और पॉप सिंगर माइकल जैक्सन की असमय मृत्यु के साथ ही वर्ष का समापन कोपेनहेगन की असफलता के साथ हुआ।
बीते साल की उपलब्यिों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिकी यात्रा को भला कैसे भुला जा सकता है। ओबामा प्रशासन की गर्मजोशी देखने लायक थी। २१वीं सदी में वैश्विक चुनौतियों से निपटने और अपने अवाम की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिहाज से भारत-अमेरिकी साझीदारी महत्वपूर्ण रही। इस यात्रा के दौरान छह समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। र्ष की खास द्घटनाओं में श्रीलंका में लिट्टे और प्रभाकरन का अंत प्रमुख रहा। श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के अंतिम ठिकाने मुल्लईतिब पर कब्जा कर लिया। लिट्टे की युद्ध विराम की द्घोषणा और दुनिया भर से तमाम विरोध के बावजूद श्रीलंका ने लिट्टे को नेस्तनाबूद कर देने का अभियान जारी रहा। श्रीलंका सरकार ने आर- पार की लड़ाई का मन बना लिया। लिट्टे और सेना के बीच निर्णायक कही जाने वाली इस जंग में हजारों निर्दोष तमिल नागरिक मारे गये, लाखों की तादाद में शरणार्थी बने। आखिरकार लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण को श्रीलंकाई सेना ने मार गिराया। पिछले छब्बीस सालों में दक्षिण एशिया की यह सबसे बड़ी कार्रवाई रही। द्घमासान लड़ाई में लिट्टे के कई प्रमुख कमांडरों समेत ढाई सौ लड़ाके मारे गए। मरने वालों में प्रभाकरण, उसका बेटा चार्ल्स एंथनी, प्रभाकरण के शीर्ष सहयोगी खुफिया इकाई के प्रमुख पोट्ट अम्मन और नौ सेना प्रमुख सूसई शामिल रहे।
पिछले साल का सबसे बड़ा आश्चर्य रहा ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलना। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के नाम नोबेल पुरस्कार चौकाने वाला रहा। जिसे लेकर इस पुरस्कार पर सवाल भी उठे। स्वयं ओबामा ने अपने को इस पुरस्कार के लायक नहीं माना। लगभग आधी सदी तक चले शीत युद्ध के बाद विद्घटित रूस के साथ अमेरिकी रिश्तों की बर्फ पिद्घलती दिखी। बराक ओबामा रूस से बेहतर संबंध बनाने के इच्छुक दिखे। कई महत्वपूर्ण समझौते के बावजूद ओबामा की रूस में मौजूदगी मौसम के तापमान के साथ ठंडी दिखी। पिछले बीस सालों से रिश्ते पर जमीं बर्फ इतनी सख्त हो चुकी थी जिसे हटाना ओबामा के लिए काफी मुश्किल रहा। वर्ष २००९ की शुरूआत बांग्लादेश के लिए अच्छी रही। सात साल बाद हुए आम चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली शेख हसीना प्रधानमंत्री बनी। लेकिन साल के दुसरे महीने में २५ फरवरी को बीडीआर जवानों ने विद्रोह कर दिया। लगभग ३३ द्घंटे तक चले इस विद्रोह में सेना के अधिकारियों समेत करीब ७४ लोग मारे गए। इसी साल जून में बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि शेख मुजीबुरेरहमान ने ही बांग्लादेश की आजादी की द्घोषणा की थी इसलिए उन्हें राष्ट्रपिता माना जाना चाहिए। साल के मध्य में समुद्री तूफान 'आइला' ने बांग्लादेश में भयंकर तबाही मचाई।
पड़ोसी देश नेपाल में भी प्याले में तूफान रहा। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के इस्तीफे के बाद नेपाल में तूफान सा आ गया। ढाई सौ वर्षों के बाद नेपाल की राजशाही का अवसान हुआ। देश में लोकतंत्र बहाली की उम्मीदें जगी लेकिन बाद में वह भी धूमिल होने लगीं। सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल को बर्खास्त करने के प्रचंड के फैसले ने तूफान ला दिया। सहयोगी दलों के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गयी। अंततः प्रचंड को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। आतंक का पर्याय बन चुके अफगानिस्तान में २० अगस्त को चुनाव संपन्न हुए। भय, हिंसा और संगीन के साये में लोगों ने मतदान किया। कई देशों के पर्यवेक्षक वहां मौजूद रहे। सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए। लेकिन चुनाव परिणाम किसी के पक्ष में नहीं आया। हमीद करजई के निकटतम प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला-अब्दुल्ला ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। आखिरकार फिर से मतदान हुआ और करजई को दूसरे कार्यकाल के लिए अफगानिस्तान का राष्ट्रपति नियुक्त किया गया।
पड़ोसी देश म्यांमार में लगभग पांच दशकों से लोकतंत्र के आंदोलन को पैरों तले रौंदने वाली सैन्य सरकार की तानाशाही चरम पर रही। पिछले तेरह सालों से अपने ही द्घर में नजरबंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की इस वर्ष भी हिरासत में रहीं। जनाल थानश्वे की अगुवाई में निरंकुश सैन्य सरकार ने सूकी की रिहाई के लिए दुनिया भर से उठी आवाजों को एक बार फिर दरकिनार कर दिया। १९९० में हुए आम चुनाव में सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को मिली भारी सफलता के बाद उन्हें निर्वाचित प्रधानमंत्री द्घोषित किया गया था लेकिन सैनिक तानाशाही ने सू की जीत को मानने से इनकार कर दिया और सत्ता हस्तांतरण से मना कर दिया। म्यांमार की गोपनीय परमाणु गतिविधियों ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। म्यांमार के इस कदम से दक्षिण एशिया की सुरक्षा को गहरा धक्का लगा।
ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद अमेरिकी सरकार की आंखों की किरकिरी बने रहे। अमेरिका अहमदीनेजाद की जीत से बौखला गया। तमाम विरोधों के बावजूद आखिरकार ५ अगस्त को ईरान के राष्ट्रपति पद की दूसरी बार अहमदीनेजाद ने शपथ ली। अहमदीनेजाद की भारी जीत के बाद चुनाव हारे मीर हुसैन मुसवी के समर्थकों ने चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। दुनिया के सामने इसे ईरान पर मंडराता संकट बताया गया। दरअसल यह ईरान का आंतरिक संकट नहीं, बल्कि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा दिखाया गया संकट था। अहमदीनेजाद की जीत से अमेरिका के मामले पर पसीना आ गया। वर्ष २००९ में नस्लवाद का मुद्दा छाया रहा। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों और भारतीय मूल के लोगों पर हमले जारी रहे। नस्लवाद के आरोपों को लेकर हो हल्ला मचता रहा। इन द्घटनाओं के बाद ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहे भारतीयों छात्रों के बीच दशहत का माहौल रहा। भारतीय अधिकारियों ने ऑस्ट्रेलिया सरकार को अपनी चिंता से अवगत कराया। ऑस्ट्रेलिया में नस्लीय हमलों के विरोध में हजारों की संख्या में भारीतय छात्र सड़कों पर उतरे। लगातार हो रहे हमलों से नेता, अभिनेता दोनों नाराज दिखे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी से मिलने वाली डॉक्टरेट की मानक उपाधि लेने से इंकार कर दिया। ऑस्ट्रेलिया में इस तरह की सैकड़ों द्घटनाएं द्घटीं।
वर्ष २००९ में जापान के चुनाव सम्पन्न हुए। जापान पर लगातार पचपन वर्ष से सत्ता पर काबिज लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को जनता ने नकार दिया। विपक्षी पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान को नयी बागडोर संभालने को मिली। हातोयामा ने इसे सत्ता के लिए मतदान करार दिया। इस चुनाव में सत्तारूढ़ दल के कई बड़े नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा। हातोयामा, अपने दादा इशिरो हातोयान के बाद अपने परिवार के दूसरे सदस्य हैं, जिन्होंने जापान के प्रधानमंत्री का पद संभाला।बीते वर्ष की प्रमुख द्घटनाओं में अमेरिका के अश्वेत राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का काहिरा संबोधन लोकप्रिय हुआ। उन्होंने अमेरिका और इस्लाम के बीच मतभेद मिटाने का आह्वान किया। अपने भाषण में ओबामा ने अमेरिका के प्रति मुस्लिम देशों की नाराजगी को दूर करने की हर संभव कोशिश की। उन्होंने मुस्लिम देशों की दुखती रगों को छूने की कोशिश की। अफगानिस्तान और इराक में फैला अमेरिका प्रशासन मुसलमानों के प्रति अपनी सदाशयता का प्रयास करता दिखा। अमेरिका को ऐसा प्रतीत होने लगा कि हर समस्या का समाधान जंग से नहीं हो सकता।
वर्ष २००९ में भारत चीन के रिश्ते में खटास देखने को मिली। चीनी सेना ने भारत के लददख क्षेत्र में द्घुसकर चीनी भाषा में लाल रंग से 'चीन' लिख दिया। चीन ने न सिर्फ भारतीय सीमा में द्घुसपैठ बढ़ाई, बल्कि पड़ोसी देशों में दखल बढ़ाकर भारत को द्घेरने की कोशिश की। उसका यह कदम विस्तारवादी रणनीति का रहा। चीन का सिनजियांग प्रांत अपनी सांप्रदायिक हिंसा के कारण चर्चा में रहा। पांच जुलाई २००९ को भड़के इस दंगे में दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए और आठ सौ से अधिक द्घायल हुए। दुनिया ने सिनजियांग की वीभत्स तस्वीरों को देखा। अपराध जगत की महारानी जई कीपिंग की गिरफ्तारी भी चर्चा में रही। छियालिस वर्षीय यह महिला गैर कानूनी तरीके से जुए के अड्डे चलाने के लिए जानी जाती है। साथ ही लोगों को गैर कानूनी तरीके से बंधक बनाने, समुद्र तटीय नगरों में अवैध तरीकों से नशीले पदार्थ बेचने का आरोप उन पर लगा।
फरवरी २००८ में पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली बेनजीर भुट्टो के कत्ल की इबारत लिखने के बाद शुरू हुई। लेकिन वर्ष २००९ में पाकिस्तान में पूरी तरह अराजकता रही। सुधार की बात तो दूर पाकिस्तान आतंकवाद के दलदल में धंसता चला गया। देश में जातीय हिंसा, आतंकवाद और अर्थिक संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में तालिबान और अलकायदा की चुनौती कमजोर होने की बजाय दिन-ब-दिन बढ़ती ही गयी। अमेरिकी हाथों से संचालित ऑपरेशन में कई मासूमों की जानें गयीं। पाकिस्तान का बलूचिस्तान दूसरा बांग्लादेश बनने की ओर अग्रसर दिखा। पाक सरकार ने अपनी नाकामी का ठीकरा भारत और अफगानिस्तान के सिर फोड़ने का प्रयास किया। ब्लूचिस्तान में पाकिस्तान विरोधी गतिविधियां वर्ष २००४ में और बढ़ी। गत वर्ष पाकिस्तान पर कई आतंकी हमले हुए।
तमाम आरोपों और विरोधों के बीच अफ्रीकी कांग्रेस के शीर्ष और बहुचर्चित नेता जैकब जुमा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने में सफल रहे। जुमा को रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। पूर्व राष्ट्रपति थाबो म्बेकी की सारी चालें धरी की धरी रह गई। अपहरण, भ्रष्टाचार दलाली और बलात्कार जैसे आरोपों को खारिज कर जनता ने उन्हें अपने सर आंखों पर बिठाया। इसमें जैकब की जनता के बीच लोकप्रियता और गरीबों के मसीहा की छवि अहम रही। नौ मई २००९ को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले जैकब जुमा दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यक अश्वेत नागरिाकों के बीच काफी लोकप्रिय रहे। 'गरीबों का मसीहा और आमजन का प्रतिनिधि' का नारा देकर चुनाव जीतने वाले जैबक जुमा दक्षिण अफ्रीका की गरीब अश्वेत की उम्मीदों की किरण बने।वर्ष २००९ में जर्मनी में सम्पन्न हुए चुनाव में जनता ने एक बार फिर मॉकेल पर ही भरोसा किया। पूर्ववर्ती सतारूढ़ गठबंधन में शामिल रहे अपने प्रतिद्वंद्वी दल को धूल चटाते हुए लगातार दूसरी बार न सिर्फ शानदार जीत दर्ज की बल्कि अपने पसंदीदा दल के साथ गठबंधन बनाने में भी सफल रहीं।
विलासिता और भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में रहे इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी साल के आखिर में जनता के कोप का शिकार बने। मिलान शहर में एक व्यक्ति ने उन पर हमला कर उन्हें द्घायल कर दिया। इससे पहले जॉर्ज बुश पर भी जूता फेंका गया था। २००९ में नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में चर्चा में रहा सीटीबीटी एक बार फिर बहस के केन्द्र में रहा। परमाणु बमों का आतंकवादियों के हाथ लगने का भय भी दुनिया को सताता रहा। अमेरिका सरकार में तकरीबन दस वर्षों के बाद 'सीटीबीटी' को वैश्विक बहस के केन्द्र में लाने की कवायद शुरू हुई।वैसे यह साल कुदरती कहर का भी रहा। दुनिया के कई देशों में बीते साल कुदरत ने अपना कहर बरपाया। इंडोनेशिया,वियतनाम फिलीपींस और इटली में भारी तबाही हुई। सैकड़ो लोगों की जानें गयी।
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